१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
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Read in context२० अध्यात्मोपनिषद् ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं मृषामात्रा उपाधयः । ततः पूर्णं स्वमात्मानं पश्येदेकात्मना स्थितम् ॥ १९ ॥ ब्रह्मा से स्तम्ब (तृण) पर्यन्त समस्त उपाधियाँ मिथ्या हैं, इसलिए सदा एक स्वरूप में अवस्थित रहने वाले अपने पूर्ण आत्मा का ही सर्वत्र दर्शन करना चाहिए ॥ १९ ॥ स्वयं ब्रह्मा स्वयं विष्णुःस्वयमिन्द्रः स्वयं शिवः । स्वयं विश्वमिदं सर्वं स्वस्मादन्यन्न किंचन ॥२० स्वयं ब्रह्मा, स्वयं विष्णु, स्वयं इन्द्र, स्वयं शिव, स्वयं विश्व और स्वयं ही यह सब कुछ है। स्वयं के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है ॥ २० ॥ स्वात्मन्यारोपिताशेषाभासवस्तुनिरासतः । स्वयमेव परंब्रह्म पूर्णमद्वयमक्रियम् ॥ २१ ॥ अपनी आत्मा में समस्त वस्तुओं का आभास (रस्सी में सर्प की तरह) केवल आरोपित है, उसका निराकरण (निरसन) कर देने से वह स्वतः पूर्ण, अद्वैत और अक्रिय (क्रियारहित) परब्रह्म बन जाता है ॥ २१ ॥ असत्कल्पो विकल्पोऽयं विश्वमित्येकवस्तुनि । निर्विकारे निराकारे निर्विशेषे भिदा कुतः ॥ २२ एक ही आत्मा रूपी वस्तु में जो यह विकल्प (भेद) प्रतीत होता है, वह प्रायः मिथ्या है; क्योंकि निर्विकार, निराकार और निर्विशेष में भेद ही कहाँ है ? ॥ २२ ॥ द्रष्टदर्शनदृश्यादिभावशून्ये निरामये । कल्पार्णव इवात्यन्तं परिपूर्णे चिदात्मनि ॥ २३ ॥ वह चैतन्य (आत्मा) द्रष्टा, दर्शन और दृश्य आदि भावों से शून्य है, जो निरामय (निर्दोष) तथा प्रलय - कालीन सागर की तरह परिपूर्ण है ॥ २३ ॥ तेजसीव तमो यत्र विलीनं भ्रान्तिकारणम् । अद्वितीये परे तत्त्वे निर्विशेषे भिदा कुतः ॥२४॥ जिस प्रकार अन्धकार प्रकाश में विलीन हो जाता है, उसी प्रकार अद्वितीय परम तत्त्व में भ्रान्ति का कारण भी विलुप्त हो जाता है। वह आत्मा अवयव रहित है, अस्तु, उसमें भेद कहाँ है ? ॥ २४ ॥ एकात्मके परे तत्त्वे भेदकर्त्ता कथं वसेत् । सुषुप्तौ सुखमात्रायां भेदः केनावलोकितः ॥२५ ॥ एकात्मक परमतत्त्व में भेदकर्ता किस प्रकार रह सकता है ? सुषुप्तावस्था में सुख मात्र है, उसमें भेद किसके द्वारा देखा गया है ॥ २५ ॥ चित्तमूलो विकल्पोऽयं चित्ताभावे न कश्चन । अतश्चित्तं समाधेहि प्रत्यग्रूपे परात्मनि ॥ २६ ॥ इस विकल्प (भेद) का मूल कारण चित्त है। यदि चित्त न हो, तो कोई भी विकल्प नहीं है। अतः प्रत्यग् रूप परमात्मा में अपने चित्त को समाधिस्थ (समाहित) कर दो ॥ २६ ॥ अखण्डानन्दमात्मानं विज्ञाय स्वस्वरूपतः । बहिरन्तः सदानन्दरसास्वादनमात्मनि ॥ २७ ॥ अखण्डानन्द रूप आत्मा को अपना वास्तविक स्वरूप जानकर, सदा इस आत्मा में ही बाहर और अन्दर आनन्द रस का आस्वादन, करो ॥ २७ ॥ वैराग्यस्य फलं बोधो बोधस्योपरतिः फलम् । स्वानन्दानुभवाच्छान्तिरेषैवोपरतेः फलम् ॥२८ ॥ वैराग्य का फल बोध (ज्ञान) है, ज्ञान का फल उपरति (विषयों से विरत होना) है और उपरति का फल आत्मानन्द के अनुभव से प्राप्त शान्ति है ॥ २८ ॥ यद्युत्तरोत्तराभावे पूर्वपूर्वं तु निष्फलम् । निवृत्तिः परमा तृप्तिरानन्दोऽनुपमः स्वतः ॥ २९ ॥ उपर्युक्त वस्तुओं में जो उत्तरोत्तर न हो, उससे पूर्व की वस्तु निष्फल है। विषयों से निवृत्ति ही परम तृप्ति है और आत्मा का आनन्द स्वयं ही अनुपम है ॥ २९ ॥ मायोपाधिर्जगद्योनिः सर्वज्ञत्वादिलक्षणः । पारोक्ष्यशबलःसत्याद्यात्मकस्तत्पदाभिधः ॥ ३० ॥