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१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished414 pages

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३०८ संन्यासोपनिषद् षष्टिं कुलान्यतीतानि षष्टिमागामिकानि च। कुलान्युद्धरते प्राज्ञः संन्यस्तमिति यो वदेत् ॥ १० ॥ जो ज्ञानी मनुष्य 'मैं संन्यासी हो गया' ऐसा स्वीकार वचन बोलता है, वह अपने जन्म के पूर्व की साठ पीढ़ियों तथा आगे आने वाली साठ पीढ़ियों को भवसागर से मुक्त कर देता है ॥ १० ॥ ये च संतानजा दोषा ये दोषा देहसंभवाः। प्रैषाग्निर्निर्दहेत्सर्वंस्तुषाग्निरिव काञ्चनम् ॥ ११॥ संन्यासी के जो पैतृक दोष हैं तथा जो स्वयं के अपने शारीरिक दोष हैं, उन सभी को वह उसी तरह से भस्म कर देता है, जिस तरह तुषाग्नि सुवर्ण की गन्दगी को जला डालती है ॥ ११ ॥ सखा मा गोपायेति दण्डं परिग्रहेत् ॥ १२ ॥ हे सखा ! आप हमारी रक्षा करें, इस प्रकार कहकर दण्ड को धारण करना चाहिए ॥ १२ ॥ दण्डं तु वैणवं सौम्यं सत्वचं समपर्वकम्। पुण्यस्थलसमुत्पन्नं नानाकल्मषशोधितम् ॥ १३ ॥ अदग्धमहतं कीटैः पर्वग्रन्थिविराजितम्। नासादघ्नं शिरस्तुल्यं भ्रुवोर्वा बिभृयाद्यतिः ॥ १४॥ दण्ड उत्तम-श्रेष्ठ बाँस का सीधा, छाल सहित, समान (संख्या युक्त) गाँठ वाला होना चाहिए। उसका आविर्भाव श्रेष्ठ स्थान में हुआ हो, किसी भी तरह का दाग-धब्बा आदि न हो, जला हुआ भी न हो तथा कृमि- कीटक आदि के द्वारा खाया भी न गया हो पर्व ग्रन्थि-युक्त (गाँठ सहित) वह (दण्ड) लम्बाई में नासिका, शिखा (चोटी) अथवा भ्रुकुटी तक का होना चाहिए ॥ १३-१४ ॥ दण्डात्मनोस्तु संयोगः सर्वथा तु विधीयते। न दण्डेन विना गच्छेदिक्षुक्षेपत्रयं बुधः ॥ १५ ॥ दण्ड एवं आत्मा का संयोग सदा ही श्रेयस्कर है। इस कारण संन्यासी को दण्ड के अभाव में तीन बार बाण फेंकने की दूरी से बाहर न जाना चाहिए ॥ १५ ॥ जगज्जीवनं जीवनाधारभूतं मा ते मा मन्त्रयस्व सर्वदा सर्वसौम्येति कमण्डलुं परिगृह्य योगपट्टाभिषिक्तो भूत्वा यथासुखं विहरेत् ॥ १६ ॥ हे सर्वसौम्य ! आप जीवन के आधारभूत जल को धारण करने वाले हैं, मुझसे मन्त्रणा करते रहें- इस प्रकार से कहकर संन्यासी कमण्डलु को हाथ में ग्रहण कर योग पट्ट से सुशोभित होकर सुखानुभूतिपूर्वक यत्र- तत्र भ्रमण करे ॥ १६ ॥ त्यज धर्ममधर्मं च उभे सत्यानृते त्यज। उभे सत्यानृते त्यक्त्वा येन त्यजसि तत्तयज ॥ १७ ॥ (संन्यासी को) सभी तरह के धर्म-अधर्म तथा सत्य-असत्य दोनों का ही परित्याग कर देना चाहिए। तदनन्तर जिसके द्वारा इस प्रकार सत्य-असत्य का परित्याग किया जाता है, उसका भी त्याग कर देना चाहिए ॥ १७ ॥ वैराग्यसंन्यासी ज्ञानसंन्यासी ज्ञानवैराग्यसंन्यासी। कर्मसंन्यासीति चातुर्विध्यमुपागतः ॥ १८ ॥ संन्यासी के चार भेद बतलाये गये हैं- (१) वैराग्य संन्यासी (२) ज्ञान संन्यासी (३) ज्ञान-वैराग्य संन्यासी (४) कर्म संन्यासी ॥१८॥ तद्यथेति। दृष्टानुश्रविकविषयवैतृष्ण्यमेत्य। प्राक्पुण्यकर्मविशेषात्संन्यस्तः स वैराग्यसंन्यासी ॥ दृष्ट एवं आनुश्रविक विषयों के प्रति तृष्णारहित होकर तथा पूर्व-जन्म के पुण्यों के फलस्वरूप वैराग्य उत्पन्न होने के कारण जिस मनुष्य ने संन्यास-धर्म ग्रहण किया है, वह 'वैराग्य संन्यासी' है ॥ १९ ॥ [ सांख्य-योग की मान्यतानुसार 'दृष्ट' विषय वे हैं, जो इस लोक में 'दृष्टिगोचर' होते हैं, जैसे-रूप, रस, गन्ध आदि, धन-सम्पत्ति, स्त्री, राज-ऐश्वर्य इत्यादि। 'आनुश्रविक' विषय वे हैं, जो वेद और शास्त्रों द्वारा सुने गए हैं, ये भी