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१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished414 pages

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अध्याय २ मन्त्र ४९ ३११ चैत्यवर्जितचिन्मात्रमहमेषोऽवभासकः । सबाह्याभ्यन्तरव्यापी निष्कलोऽहं निरञ्जनः । निर्विकल्पचिदाभास एक आत्मास्मि सर्वगः ॥ ३७ ॥ मैं (संन्यासी) चैतन्य से भी परे चिन्मात्र प्रकाश से युक्त हूँ। मैं बाह्य एवं अन्तः में संव्याप्त रहने वाला निष्कल (कलारहित), निरञ्जन, निर्विकल्प, चिदाभास एवं सर्वत्र व्याप्त रहने वाला आत्मतत्त्व हूँ॥ ३७॥ मयैव चेतनेनेमे सर्वे घटपटादयः । सूर्यान्ता अवभास्यन्ते दीपेनेवात्मतेजसा ॥ ३८ ॥ मुझ एक चैतन्य स्वरूप के द्वारा ही घट-पट आदि से लेकर सूर्य पर्यन्त सभी दीपक के सदृश तेजवान् विनिर्मित किये जाते हैं॥ ३८॥ मयैवैताः स्फुरन्तीह विचित्रेन्द्रियवृत्तयः । तेजसान्तः प्रकाशेन यथाग्निकणपङ्क्तयः ॥ ३९ ॥ ये सभी इन्द्रियों की विचित्र एवं भिन्न-भिन्न प्रकार की वृत्तियाँ (पंक्तियाँ) मेरे अन्तःकरण के प्रकाश से ही प्रादुर्भूत होती हैं। जैसे-अग्नि से चिनगारियाँ निःसृत होती हैं॥ ३९॥ अनन्तानन्दसंभोगा परोपशमशालिनी । शुद्धेयं चिन्मयी दृष्टिर्जयत्यखिलदृष्टिषु ॥ ४० ॥ यह पवित्र चिन्मय दृष्टि अन्तरहित, शाश्वत, आनन्द का उपभोग करने वाली एवं अत्यन्त शान्ति प्रदान करने वाली है। यह अन्य समस्त दृष्टियों पर विजय पाने वाली है॥ ४० ॥ सर्वभावान्तरस्थाय चैत्यमुक्तचिदात्मने । प्रत्यक्चैतन्यरूपाय मह्यमेव नमो नमः ॥ ४१ ॥ यह मुक्तात्मा सभी तरह की भावनाओं में स्थायी रूप से स्थित रहता है, यह चैत्य अवस्था से भी मुक्त चिदात्मा है। इस प्रत्येक चैतन्य रूप वाले आत्मा को नमस्कार है॥ ४१॥ विचित्राः शक्तयः स्वच्छाः समा या निर्विकारया । चिता क्रियन्ते समया कलाकलनमुक्तया ॥ कालत्रयमुपेक्षित्या हीनायाश्चैत्यबन्धनैः । चितश्चैत्यमुपेक्षित्याः समतैवावशिष्यते ॥ ४३ ॥ कला एवं कल्पनाविहीन चित्शक्ति से ही इन विचित्र, स्वच्छ तथा समभाव सम्पन्न शक्तियों का प्राकट्य हुआ है। यह चित् शक्ति तीनों कालों में सर्वाधिक शक्ति-सम्पन्न, दृश्यजगत् के बन्धनों से मुक्त है॥४२-४३॥ सा हि वाचामगम्यत्वादसत्तामिव शाश्वतीम् । नैरात्मसिद्धात्मदशामुपयातैव शिष्यते ॥ ४४ ॥ ईहानीहामयैरन्तर्या चिदावलिता मलैः । सा चिन्नोत्पादितुं शक्ता पाशबद्धेव पक्षिणी ॥४५॥ इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन जन्तवः । धराविवरमग्नानां कीटानां समतां गताः ॥ ४६ ॥ यह वाणी से न जाने जा सकने वाली है। शाश्वत असत्ता तथा निरति आत्मा के सदृश वही शेष रहती है। जो चित्शक्ति इच्छा एवं अनिच्छा में स्थित है, वह मलों से आच्छादित है तथा पाश से आबद्ध पक्षिणी की भाँति उड़ने में असमर्थ होती है। इच्छा एवं द्वेष से प्रादुर्भूत द्वन्द्वभाव के कारण ये मोहवश पृथ्वीरूपी गड्ढे में पतित हुए कृमि-कीटों के ही समान हैं॥ ४४-४६॥ आत्मनेऽस्तु नमो मह्यमविच्छिन्नचिदात्मने । परामृष्टोऽस्मि बुद्धोऽस्मि प्रोदितोऽस्म्यचिरादहम् ॥४७ मुझ अविच्छिन्न चिद्रूप आत्मा को नमन-वंदन है। मैं सतत, परम प्रत्यक्ष, बुद्ध एवं उदित हूँ ॥४७॥ उद्धतोऽस्मि विकल्पेभ्यो योऽस्मि सोऽस्मि नमोऽस्तु ते। तुभ्यं महामनन्ताय मह्यं तुभ्यं चिदात्मने ॥ मैं उद्धत हूँ, विकल्पों से परे हूँ, मैं जो हूँ, मैं ही सो हूँ, मुझे नमस्कार है। तुम और मैं अन्तरहित हैं। मैं एवं तुम दोनों ही चिदात्मा हैं। दोनों को नमस्कार है॥ ४८ ॥ नमस्तुभ्यं परेशाय नमो मह्यं शिवाय च । तिष्ठन्नपि हि नासीनो गच्छन्नपि न गच्छति । शान्तोऽपि व्यवहारस्थः कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ४९ ॥