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१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished414 pages

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अध्याय २ मन्त्र ७० ३१३ चेतनं चित्तिरिक्तं हि प्रत्यक्केतनमुच्यते। निर्मनस्कस्वभावत्वान्न तत्र कलनामलम् ॥६१॥ जब चेतन तत्त्व-'चित्त-मुक्त' हो जाता है, तभी यह आत्मरूप चैतन्य तत्त्व कहा जाता है। जब स्वभाव-मन (इच्छा) रहित हो जाता है, तब उसमें किसी भी तरह के दोष प्रकट नहीं होते ॥६१॥ सा सत्यता सा शिवता सावस्था पारमात्मिकी । सर्वज्ञता सा संतृप्तिर्नतु यत्र मनः क्षतम् ॥६२ ॥ वही सत्यता है, वही शिव स्वरूप है, उसमें ही परमात्मा अवस्थित है। वही सर्वज्ञता है, वही सम्पूर्ण तृप्ति है, न कि जहाँ मन क्षतिग्रस्त (मेरे-तेरे में बँटा हुआ) हो। ॥६२॥ प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि । निरस्तमननानन्दःद संविन्मात्रपरोऽस्म्यहम् ॥६३॥ यद्यपि मैं प्रलाप करता, परित्याग करता, स्वीकार करता, चक्षुओं को खोलता एवं बन्द करता रहता हूँ, फिर भी मैं मननशील, आनन्दस्वरूप, संवित् (ज्ञानरूप) आत्मा ही हूँ॥ ६३ ॥ मलं संवेद्यमुत्सृज्य मनो निर्मूलयन्परम् । आशापाशानलं छित्त्वा संविन्मात्रपरोऽस्म्यहम् ॥६४॥ संवेद्य रूपी मन को दूर करके तथा मन को निर्मूल अर्थात् बिना इच्छा किये हुए आशा रूपी फन्दे को काट करके मैं केवल संवित् रूप ही हूँ॥ ६४ ॥ अशुभाशुभसंकल्पः संशान्तोऽस्मि निरामयः । नष्टेष्टानिष्टकलनः संविन्मात्रपरोऽस्म्यहम् ॥६५॥ शुभ एवं अशुभ संकल्पों से मुक्त तथा सम्यक् रूप से शान्त होकर मैं आरोग्य अवस्था में स्थित हूँ। इष्ट तथा अनिष्ट के भाव का परित्याग करके मैं केवल संवित् रूप ही हो गया हूँ ॥ ६५ ॥ आत्मतापरते त्यक्त्वा निर्विभागो जगत्स्थितौ । वज्रस्तम्भवदात्मानमवलम्ब्य स्थिरोऽस्म्यहम् । निर्मलायां निराशायां स्वसंवित्तौ स्थितोऽस्म्यहम् ॥ ६६ ॥ राग एवं द्वेष के भावों का परित्याग करके, विभागरहित, नश्वर जगत् में प्रतिष्ठित अत्यधिक विशेष रूप से दृढ़ आत्मारूपी साम्य के आश्रय में मैं पूर्णरूप से प्रतिष्ठित हूँ। मैं अपनी निर्मल एवं आशारहित संवित् (आत्मिक दशा) में प्रतिष्ठित हूँ। ॥ ६६॥ ईहितानीहितैर्मुत्को हेयोपादेयवर्जितः । कदान्तस्तोषमेष्यामि स्वप्रकाशपदे स्थितः ॥ ६७ ॥ चेष्टा और चेष्टारहित तथा हेय एवं उपादेय की भावना से मैंने मुक्ति को प्राप्त कर लिया है। मैं आत्मिक संतोष को कब प्राप्त करूँगा? स्वयं प्रकाश स्वरूप पद में कब प्रतिष्ठित होऊँगा ॥ ६७ ॥ कदोपशान्तमननो धरणीधरकन्दरे । समेष्यामि शिलासाम्यं निर्विकल्पसमाधिना ॥ ६८ ॥ पर्वत-श्रृंखला की गुफा में आसन ग्रहण करके शांत भाव से कब चिन्तन-मनन करूँगा। मैं निर्विकल्प समाधि लगाकर शिला के समान कब चेष्टारहित हो जाऊँगा ? ॥ ६८ ॥ निरंशध्यानविश्रान्तिमूकस्य मम मस्तके। कदा तार्णं करिष्यन्ति कुलायं वनपत्रिणः ॥ ६९ ॥ मैं उस अंश-विहीन अविनाशी ब्रह्म के चिन्तन में इस तरह से कब निश्चल हो जाऊँगा कि कोयल पक्षी हमारे मस्तक पर घोंसला विनिर्मित कर लें ॥ ६९ ॥ संकल्पपादपं तृष्णालतं छित्त्वा मनोवनम् । विततां भुवमासाद्य विहरामि यथासुखम् ॥७०॥ मैं संकल्प रूपी वृक्षों तथा तृष्णा रूपी लताओं को काटकर मन रूपी विशाल वन को पारकर विस्तृत भूमि (मैदान) में पहुँचकर आनन्द पूर्वक विचरण करता हूँ ॥ ७० ॥