१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
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Read in contextअध्याय ५ खण्ड २ मन्त्र १ १४३ इसके बाद अब यदि वह महत्त्व का अभिलाषी हो, तो उसे अमावस्या को दीक्षा प्राप्त करके पूर्णिमा की रात्रि को सभी औषधियों, दही और शहद सम्बन्धी मन्थ (मथकर तैयार किया गया हव्य) का मंथन कर 'ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय स्वाहा' के मन्त्र द्वारा अग्नि में घृत की आहुति देकर मन्थ में उसका अवशेष डालना चाहिए॥ वसिष्ठाय स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे संपातमवनयेत्प्रतिष्ठायै स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे संपातमवनयेत्संपदे स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे संपातमवनयेदायतनाय स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे संपातमवनयेत् ॥ ५ ॥ (इसी प्रकार) 'वसिष्ठाय स्वाहा' के मन्त्र से अग्नि में घृताहुति समर्पित कर मन्थ में भी घृत के स्राव को डाले, 'प्रतिष्ठायै स्वाहा' इस मन्त्र से अग्नि को घृताहुति समर्पित करके मन्थ में घृत के अवशेष को डाले, 'संपदे स्वाहा' मन्त्र के द्वारा अग्नि में हवन करके अवशिष्ट घृत को मंथ में डाले तथा 'आयतनाय स्वाहा' इस मंत्र से अग्नि में घृत की आहुति देकर शेष घृत को मन्थ में समर्पित करे॥ ५॥ अथ प्रतिसृप्याञ्जलौ मन्थमाधाय जपत्यमो नामास्यमा हि ते सर्वमिदं स हि ज्येष्ठः श्रेष्ठो राजाधिपतिः स मा ज्यैष्ठ्यं श्रेष्ठ्यं राज्यमाधिपत्यं गमयत्वहमेवेदं सर्वमसानीति ॥ ६ ॥ (तत्पश्चात्) अग्नि से कुछ दूर हटकर अञ्जलि में मन्थ को लेकर इस मन्त्र का उच्चारण करे-'अमो नामसि' हे मन्थ ! तू 'अम' (प्राण) नाम वाला है, क्योंकि यह सम्पूर्ण जगत् (अपने प्राणभूत) तेरे साथ अवस्थित है। तू ही ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, राजा (प्रकाशमान) और सबका अधिपति है। वह तुम मुझे ज्येष्ठ और श्रेष्ठ तत्त्व, राज्य और आधिपत्य को प्राप्त कराओ। मैं ही सर्वरूप हो जाऊँ॥ ६॥ अथ खल्वेतयर्चा पच्छ आचामति तत्सवितुर्वृणीमह इत्याचामति वयं देवस्य भोजनमित्याचामति श्रेष्ठं सर्वधातममित्याचामति तुरं भगस्य धीमहीति सर्वं पिबति ॥ ७॥ तदनन्तर वह इस ऋचा से (हम प्रकाशमान सविता के उस सर्वविषयक श्रेष्ठतम भोजन की प्रार्थना करते हैं और शीघ्र ही सविता देवता के स्वरूप का ध्यान करते हैं) पादशः (उस मन्थ का) एक-एक पद को कहकर मध्य के एक-एक ग्रास का भक्षण करता है। 'तत्सवितुर्वृणीमहे' ऐसा कहकर एक ग्रास का भक्षण करता है। 'वयं देवस्य भोजनम्' ऐसा कहकर एक ग्रास का भक्षण करता है। 'श्रेष्ठं सर्वधातमम्' मन्त्र कहकर पुनः एक ग्रास को ग्रहण करता है तथा 'तुरं भगस्य धीमहि' ऐसा कहकर कंस अथवा चमस के आकार वाले पात्र को धोकर सम्पूर्ण मंथ लेप को पी जाता है॥ ७॥ निर्णिज्य कंसं चमसं वा पश्चादग्नेः संविशति चर्मणि वा स्थण्डिले वा वाचंयमोऽप्रसाहः स यदि स्त्रियं पश्येत्ससमृद्धं कर्मेति विद्यात् ॥ ८ ॥ इसके बाद अग्नि के पृष्ठ भाग पर पीछे की ओर पवित्र मृग चर्म आदि बिछाकर अथवा स्थण्डिल (पवित्र यज्ञ भूमि) में ही वाणी का संयम रखते हुए शयन करता है। उस समय यदि वह स्वप्न में स्त्री का दर्शन करे, तो यह समझे कि मेरा यह अनुष्ठान सफलता को प्राप्त हो गया ॥ ८ ॥ तदेष श्लोकः । यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियं स्वप्नेषु पश्यति । समृद्धिं तत्र जानीयात्तस्मिन्स्वप्ननिदर्शने तस्मिन्स्वप्ननिदर्शन इति ॥ ९ ॥ इससे सम्बन्धित यह श्लोक है- 'काम्य कर्मों में जब स्त्री को देखे, तो उस स्वप्न के दर्शन होने पर उस कार्य की सफलता समझे ॥ ९॥