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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished505 pages

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अध्याय ३ ब्राह्मण ८ मन्त्र ६ २९३ ॥ अष्टमं ब्राह्मणम् ॥ अथ ह वाचक्रव्युवाच ब्राह्मणा भगवन्तो हन्ताहमिमं द्वौ प्रश्नौ प्रक्ष्यामि तौ चेन्मे वक्ष्यति न वै जातु युष्माकमिमं कश्चिद्ब्रह्मोद्यं जेतेति पृच्छ गार्गीति ॥ १ ॥ इसके पश्चात् वाचक्रवी गार्गी ने कहा-हे पूज्य ब्राह्मणो ! अब मैं इन (याज्ञवल्क्य) से दो प्रश्न करूँगी । यदि ये इन दोनों के उचित उत्तर दे सकेंगे, तो यह सुनिश्चित हो जाएगा कि ये अजेय हैं (ब्रह्म सम्बन्धी चर्चा में इन्हें जीतना किसी के लिए सम्भव नहीं है), तब ब्राह्मणों ने कहा-ठीक है, गार्गी अब प्रश्न पूछो ॥ १ ॥ सा होवाचाहं वै त्वा याज्ञवल्क्य यथा काश्यो वा वैदेहो वोग्रपुत्र उज्ज्यं धनुरधिज्यं कृत्वा द्वौ बाणवन्तौ सपत्नातिव्याधिनौ हस्ते कृत्वोपोत्तिष्ठेदेवमेवाहं त्वा द्वाभ्यां प्रश्नाभ्यामुपोदस्थां तौ मे ब्रूहीति पृच्छ गार्गीति ॥ २ ॥ गार्गी ने कहा- हे याज्ञवल्क्य ! जैसे काशी अथवा विदेह में रहने वाला कोई वीर वंशी प्रत्यञ्चा हीन धनुष पर प्रत्यञ्चा चढ़ाकर शत्रु पीड़ादायक बाणों को हाथ में लेकर सन्नद्ध होता है, वैसे ही मैं आपके समक्ष दो प्रश्नों को लेकर उपस्थित हुई हूँ, आप मुझे उनका उत्तर प्रदान करें। याज्ञवल्क्य बोले- हे गार्गी ! आप अवश्य प्रश्न करें ॥ २ ॥ सा होवाच यदूर्ध्वं याज्ञवल्क्य दिवो यदवाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते कस्मिँस्तदोतं च प्रोतं चेति ॥ ३ ॥ गार्गी ने पूछा- हे याज्ञवल्क्य ! जो द्युलोक से ऊपर और पृथिवी लोक से नीचे है तथा द्यौ और पृथिवी के ठीक बीच में स्थित है, जो स्वतः द्यु और पृथिवी लोक है तथा जो स्वयं भूत, भविष्यत् और वर्तमान है, वह किसमें ओतप्रोत है ? ॥ ३ ॥ स होवाच यदूर्ध्वं गार्गि दिवो यदवाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षत आकाशे तदोतं च प्रोतं चेति ॥ ४ ॥ याज्ञवल्क्य ने कहा- हे गार्गी ! द्युलोक से ऊपर, पृथिवी से नीचे तथा द्यु और पृथिवी के मध्य भाग में जो स्थित है, स्वयं भी जो द्यु और पृथिवी है और जो भूत, भविष्यत् और वर्तमान कहलाता है, वह आकाश में ओत-प्रोत है ॥ ४ ॥ सा होवाच नमस्तेऽस्तु याज्ञवल्क्य यो म एतं व्यवोचोऽपरस्मै धारयस्वेति पृच्छ गार्गीति ॥ ५ ॥ गार्गी ने कहा- हे याज्ञवल्क्य ! आपको नमस्कार है, आपने मेरे (एक) प्रश्न का उत्तर दिया है। अब द्वितीय प्रश्न का उत्तर भी दीजिए। याज्ञवल्क्य ने कहा कि ठीक है, उसे भी पूछिये ॥ ५ ॥ सा होवाच यदूर्ध्वं याज्ञवल्क्य दिवो यदवाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते कस्मिँस्तदोतं च प्रोतं चेति ॥ ६ ॥ गार्गी ने कहा- जो द्युलोक के ऊपर, पृथिवी लोक के नीचे, द्यु और पृथिवी के मध्य तथा जो स्वयं भी द्यु और पृथिवी है, जिसे भूत, भविष्यत् और वर्तमान कहा जाता है, वह किसमें ओत-प्रोत है ? ॥ ६ ॥