१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
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Read in contextअध्याय १ वल्ली १ मन्त्र १० ५१ स होवाच पितरं तत कस्मै मां दास्यसीति। द्वितीयं तृतीयं तꣳहोवाच मृत्यवे त्वा ददामीति ॥ ४ ॥ ऐसा विचार करके नचिकेता ने अपने पिता से कहा- हे तात ! आप मुझे किसको दान स्वरूप देंगे ? यही प्रश्न उसने दो-तीन बार पूछा। तब पिता ने क्रोधित होकर कहा-मैं तुझे मृत्यु (यम) को देता हूँ ॥ ४ ॥ बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः । किꣳस्विद्यमस्य कर्त्तव्यं यन्मयाद्य करिष्यति ॥ ५ ॥ (पिता द्वारा ऐसा कहे जाने पर पुत्र नचिकेता ने विचार किया कि) अनेक शिष्यों तथा पुत्रों में मुझे प्रथम अर्थात् उत्तम स्थान प्राप्त है और बहुतों के बीच मैं मध्यम श्रेणी का हूँ। मुझे पिताजी द्वारा यमराज को दिया जा रहा है । यम का ऐसा कौन सा कार्य है, जो मेरे द्वारा सम्पन्न हो सकता है ? ॥ ५ ॥ अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथापरे । सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिवाजायते पुनः ॥ ६ ॥ क्रोध में अनर्थमूलक वचन कहे जाने से व्यथित हो रहे अपने पिता से नचिकेता ने कहा - हे तात ! आपके पिता - पितामहादि पूर्वजों ने जैसा आचरण किया है, उस पर विचार करें तथा वर्तमान काल के दूसरे श्रेष्ठ सदाचारी जैसा आचरण करते हैं, उस पर भी दृष्टिपात करें। मरणधर्मा मनुष्य फसल की भाँति (समय पर) पकता (जर्जर होकर मृत्यु को प्राप्त होता) है और पुनः (काल क्रमानुसार) उत्पन्न होता है ॥ ६ ॥ वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहान्। तस्यैताꣳ शान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम् ॥ ७॥ (पुत्र के वचन से सहमत होकर पिता ने नचिकेता की यम के पास भेज दिया । वे बाहर गये थे, नचिकेता प्रतीक्षारत रहे । लौटने पर यम की पत्नी ने उनसे कहा-) वैश्वानर अग्नि ही ब्राह्मण अतिथि रूप में घरों में प्रवेश करते हैं। सम्भ्रान्त जन उनका अर्घ्य-पाद्यादि द्वारा सत्कार करते हैं। अतः (अर्घ्य हेतु) जल प्रदान करें ॥ ७॥ आशाप्रतीक्षे सङ्गतꣳ सूनृतां चेष्टापूर्ते पुत्रपशूꣳश्च सर्वान् । एतद्वृङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो यस्यानश्नन्वसति ब्राह्मणो गृहे ॥ ८ ॥ जिनके घर में ब्राह्मण-अतिथि भोजन किये बिना निवास करता है, उस मन्दबुद्धि पुरुष की आशा (अज्ञात इष्टार्थ की प्राप्ति अभिलाषा), प्रतीक्षा (निश्चित इष्टार्थ की प्राप्ति प्रतीक्षा) को, उनके संयोग से उपलब्ध होने वाले फल को, कूपादि निर्माणजन्य फल को तथा समस्त पुत्र और पशु आदि को (आतिथ्य सत्कार से रहित) अतिथि नष्ट कर देता है ॥ ८ ॥ तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहे मेऽनश्नन्ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः । नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन्स्वस्ति मेऽस्तु तस्मात्प्रति त्रीन्वरान्वृणीष्व ॥ ९ ॥ (यम का कथन) हे ब्रह्मन् ! आप सम्माननीय अतिथि हैं, अतः आपको नमन है। मेरा कल्याण हो । हमारे घर पर (आपने) जो तीन रात तक बिना भोजन किये ही निवास किया है, इसके फलस्वरूप एक- एक रात्रि के लिए आप हमसे तीन वर माँग लें ॥ ९ ॥ शान्तसंकल्पः सुमना यथा स्याद्वीतमन्युर्गौतमो माभि मृत्यो । त्वत्प्रसृष्टं माभिवदेत्प्रतीत एतत्त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥ १० ॥