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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished505 pages

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अध्याय १ वल्ली १ मन्त्र १८ ५३ विधि को समझाया। नचिकेता ने भी जैसा उनसे कहा गया था, ठीक उसी प्रकार यमदेव के समक्ष पुनः सुना दिया। तब (नचिकेता की ग्राह्य क्षमता से) संतुष्ट होकर यमदेव ने फिर कहा ॥ १५॥ [ वेद में 'इष्टका' शब्द स्थूल ईंटों के अतिरिक्त 'इष्ट' वस्तु के निर्माण में प्रयुक्त सूक्ष्म इकाइयों के लिए भी प्रयुक्त होता है। यहाँ स्थूल ईंटों के स्थान पर अग्नि की सूक्ष्म इकाइयों का भाव ही ग्राह्य है। लौकिक अग्नि में भी विभिन्न इकाइयाँ शामिल होती हैं। इनमें ताप (कैलोरी), प्रकाश (ल्यूमेन) तथा रंग (कलर स्पेक्ट्रम) आदि सबको पता है। स्थूल अग्नि के अनेक अन्य गुण भी उसकी इकाइयाँ कहे जा सकते हैं। यहाँ स्वर्ग प्रदायिनी दिव्य अग्नि को इकाइयों तथा उनके चयन को बात कही गयी है। गुह्य अन्तःकरण में स्थित ऊर्जा की इकाइयाँ बीज रूप में स्थित दिव्य प्रवृत्तियाँ कही जा सकती हैं। उन्हीं के जागरण एवं संयोजन से व्यक्ति, विद्वान्, कलाकार, वैज्ञानिक आदि स्तरों तक पहुँच जाता है। यमदेव ने नचिकेता को स्वर्ग तक पहुँचाने वाली दिव्य अग्नि-ऊर्जा के लिए आवश्यक सूक्ष्म इकाइयों तथा उनके संयोजन का रहस्य बतलाया है । ] तमब्रवीत्प्रीयमाणो महात्मा वरं तवेहाद्य ददामि भूयः । तवैव नाम्ना भवितायमग्निःसृंकां चेमामनेकरूपां गृहाण ॥ १६ ॥ महात्मा यमाचार्य ने प्रसन्न होकर नचिकेता से कहा- आज (माँगे गये तीन वरों के अतिरिक्त) एक वर और भी देता हूँ। मेरे द्वारा कही गयी यह अग्नि विद्या अब तुम्हारे नाम से ही प्रख्यात होगी। तुम इस अनेक रूपों वाली शब्दरूपिणी (ज्ञान तत्त्वमयी) माला को स्वीकार करो ॥ १६ ॥ [ नचिकेता का अर्थ होता है 'न चिकेतते विचेष्टते' अर्थात् जो प्रपंच से अलिप्त है। अलिप्त व्यक्ति ही दिव्य अनुशासन को धारण कर सकता है। विषयों में लिप्त व्यक्ति अपनी प्रतिभा या शक्तियों को सांसारिक कामनाओं के लिए ही लगाता रहता है, दिव्य अनुशासन पालन में लगाने के लिए उन्हें सुरक्षित नहीं रख पाता। नचिकेता ने पिता को लौकिक आकांक्षाओं या चतुराइयों से अलिप्त रहकर स्वयं को उच्च आदर्शों के प्रति समर्पित किया, इसी आधार पर उसे 'यम' के निकट पहुँचने तथा उनके अनुदान पाने का लाभ मिल सका। यम दिव्य अनुशासन के देवता हैं। ऋग्वेद १०.१३५ में उन्होंने प्रश्न किया है कि नचिकेता किस रथ (कैरियर) के माध्यम से यहाँ पहुँचा ? प्रपंच से अलिप्त रहकर दिव्य अनुशासन के लिए समर्पण की वृत्ति ही वह आधार है, जिससे नचिकेता को दिव्य अग्नि विद्या प्राप्त हुई। इसलिए उस विद्या को 'नाचिकेताग्नि' (लिप्त न होने वाले की विद्या) नाम दिया जाना ही उचित है ।] त्रिणाचिकेतस्त्रिभिरेत्य सन्धिं त्रिकर्मकृत्तरति जन्ममृत्यू । ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति ॥ १७ ॥ त्रिविध 'नाचिकेत' विद्या का ज्ञाता तीन संधियों को प्राप्त होकर, तीन कर्म सम्पन्न करके जन्म-मृत्यु से पार हो जाता है। वह ब्रह्म यज्ञरूप स्तुत्य देव का साक्षात्कार करके निश्चित रूप से अत्यंत (परम) शान्ति को प्राप्त करता है ॥ १७ ॥ [ नाचिकेत विद्या को त्रिविध कहा गया है, आचार्यों ने इसे प्राप्ति, अध्ययन तथा अनुष्ठान तीन विधियों से युक्त कहा है। साधक को इन तीनों के साथ आत्म चेतना की संधि करनी पड़ती है अथवा स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण शरीरों को इस विद्या से अनुप्राणित करना पड़ता है। इस प्रक्रिया को त्रिसंधि प्राप्ति कहा जा सकता है। कुछ आचार्यों ने माता-पिता एवं गुरु से युक्त होने को त्रिसंधि कहा है। तीन कर्म सृजन, पालन, समाहरण अथवा यज्ञीय संदर्भ में देव पूजन, संगतिकरण एवं दान कहे जाते हैं। इन सबको दिव्याग्नि विद्या के अनुरूप ढालते हुए साधक जन्म-मरण चक्र से ऊपर उठ जाता है ।] त्रिणाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा य एवं विद्वाँश्चिनुते नाचिकेतम् । स मृत्युपाशान्पुरतः प्रणोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १८ ॥