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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished505 pages

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अध्याय १ खण्ड ११ मन्त्र ६ ९७

सुनकर प्रस्तोता, उद्गाता आदि अपने-अपने कर्मों से विरत होकर बैठ गये ॥ ११ ॥ [ यदि कोई व्यक्ति केवल रटे हुए ज्ञान के आधार पर श्रेय पाने का प्रयास करते थे, तो तत्त्वज्ञ ऋषि इस प्रकार की 'आन' ( शर्त ) रखकर उनकी गहराई की परीक्षा लेते थे। वे भी तत्त्वज्ञ के आगे अपनी सीमा स्वीकार कर लेते थे। ] ॥ एकादशः खण्डः ॥ अथ हैनँ यजमान उवाच भगवन्तं वा अहं विविदिषाणीत्युषस्तिरस्मि चाक्रायण इति होवाच ॥ १ ॥ तब उषस्ति ऋषि से यजमान राजा ने कहा- मैं आप पूज्य को जानना चाहता हूँ। इस पर उषस्ति ऋषि कहने लगे- मैं चक्र का पुत्र उषस्ति हूँ ॥ १ ॥ स होवाच भगवन्तं वा अहमेभिः सर्वैरात्र्त्विज्यैः पर्येषिषं भगवतो वा अहमवित्त्वा-न्यानवृषि ॥ तब राजा ने कहा- मैंने इन सब ऋत्विक् कर्मों के लिए आपको खोजा था, परन्तु आपके न मिलने पर ही मैं इन ऋत्विजों का वरण कर चुका हूँ ॥ २ ॥ भगवाँस्त्वेव मे सर्वैरात्र्त्विज्यैरिति तथेत्यथ तर्ह्येत एव समतिसृष्टाः स्तुवतां यावत्त्वेभ्यो धनं दद्यास्तावन्मम दद्या इति तथेति ह यजमान उवाच ॥ ३ ॥ अब आप ही हमारे सम्पूर्ण यज्ञ कर्मों को सम्पन्न कराएँ। उषस्ति ऋषि ने कहा- ऐसा ही हो। अब मैं इन्हीं प्रस्तोता, उद्गाता आदि को प्रसन्नता पूर्वक स्तुति करने की आज्ञा देता हूँ और आप जितना धन इन्हें दें, उतना ही मुझे दे देना। तब राजा ने कहा वैसा ही हो ॥ ३ ॥ अथ हैनं प्रस्तोतोपससाद प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत्कतमा सा देवतेति ॥ ४ ॥ तब प्रस्तोता उषस्ति ऋषि के समीप आकर कहने लगे- हे भगवन् ! आपने मुझसे कहा था कि हे प्रस्तोतः ! आप जिस देवता की स्तुति करते हैं, उसे बिना जाने यदि स्तुति करेंगे, तो आपका मस्तक गिर जाएगा। अब आप बताएँ कि वह देवता कौन सा है ? ॥ ४ ॥ प्राण इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्राणमभ्युज्जिहते सैषा देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रास्तोष्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत्तथोक्तस्य मयेति ॥ ५ ॥ तब उषस्ति ऋषि कहने लगे कि वह देवता प्राण है। प्रलय काल में सभी प्राणी प्राण में ही प्रवेश कर जाते हैं और उत्पत्ति के समय ये प्राण से ही उत्पन्न हो जाते हैं। यह प्राण ही स्तुत्य देव है। यदि आप उसे बिना जाने स्तुति करते, तो मेरे वचन के अनुसार आपका सिर निश्चय ही गिर जाता ॥ ५ ॥ अथ हैनमुद्गातोपससादोद्गातर्या देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुद्गास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत्कतमा सा देवतेति ॥ ६ ॥ तदनन्तर उनके पास उद्गाता आकर कहने लगे- हे भगवन् ! आपने मुझसे कहा था कि हे उद्गातः ! आप जिस देवता की स्तुति करते हैं, उसे बिना जाने यदि स्तुति करेंगे, तो आपका मस्तक गिर जाएगा। अब आप बताएँ कि वह देवता कौन सा है ? ॥ ६ ॥

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