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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished572 pages

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[Header] महोपनिषद् [ ६३ ]

मुखो भूत्वा मह इति व्याहृतिरानुष्टुभं छन्दोऽथर्ववेदः सोमो देवता ॥६॥ सहस्रशीर्षं देवं सहस्राक्षं विश्वशंभुवम् । विश्वतः परमं नित्यं विश्वं नारायणं हरिम् ॥१० विश्वमेवेदं पुरुषस्तद्विश्वमुपजीवति । पतिं विश्वेश्वरं देवं समुद्रें क विश्वरूपिणम् ॥११॥

फिर उन नारायण ने अन्य सङ्कल्पयुक्त अन्तःस्थ ध्यान किया । उनके उस ध्यान से एक ऐसे पुरुष की उत्पत्ति हुई जो तीन नेत्रों वाला था तथा वह अपने हाथ में त्रिशूल धारण किये हुये था । यश, सत्य, तप, ब्रह्मचर्य, वैराग्य, नियन्त्रित मन, ऐश्वर्य, प्रणव युक्त व्याहृतियां, चारों वेद और सम्पूर्ण छन्द उस सिद्ध पुरुष में समाश्रित थे । इसीलिए उसका नाम ईशान एवम् महादेव हुआ । उन प्रसिद्ध नारायण ने पुनः अन्तःस्थ ध्यान किया, उस समय उनके ललाट से पसीना टपकते लगा । वह पसीना ही जल रूप में फैल गया । उस जल में ही एक अणुकार हिरण्यमय तेज की उत्पत्ति हुई । उस तेज से ही ब्रह्माजी उत्पन्न हुये । ब्रह्मा जी पूर्व की ओर मुख करके भूः व्याहृति, गायत्री छन्द, ऋग्वेद और अग्नि का ध्यान करने लगे । पश्चिम की ओर मुख करके भुवः व्याहृति, त्रिष्टुप छन्द, यजुर्वेद और वायु का ध्यान करने लगे । उत्तराभिमुख होकर स्वः व्याहृति, जगती छन्द, सामवेद और सूर्य का ध्यान करने लगे । फिर उन्होंने दक्षिणाभिमुख होकर महः व्याहृति, अनुष्टुप्त छन्द, अथर्ववेद और सोम का ध्यान किया । फिर उन ब्रह्मा ने सहस्रों सिर, सहस्रों नेत्र वाले, सर्व मङ्गलों के कारण, सर्वत्र व्याप्त, परात्पर और नित्य स्वरूप नारायण का ध्यान किया और उन्होंने उन जगदीश्वर के क्षीर सागर में शयन करते हुए, दर्शन किये तथा यह जाना कि यही परममुख विश्वरूप हैं और सम्पूर्ण संसार का जीवन इन्हीं पर अवलम्बित है ॥७-११॥