१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
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करना भले ही सरल कार्य हो, परन्तु चित्त-निग्रह अत्यन्त ही विषम कार्य है। यह चित्त तथा बाह्य तथा अभ्यान्तर के विषयों का ग्रहण करने वाला है, जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति रूप तीन अवस्था वाले विश्व की स्थिति चित्तवृत्ति पर ही निर्भर है। चित्त की क्षीणता ही संसार को क्षीण करने वाली है। इसलिये आवश्यक है कि चित्त का ही प्रयत्न पूर्वक उपाय किया जाय ॥११--२१॥ यां यामहं मुनिश्रेष्ठ संश्रयामि गुणश्रियम् । तां तां कृन्तति मे तृष्णा तन्त्रीमिव कुमूषिका ॥२२ पदं करोत्यलङ्घ्येऽपि तृप्तऽपि भलमोहते । चिरं तिष्ठति नैकत्र तृष्णा चपलमर्कटी ॥२३ क्षणमायाति पातालं क्षणं याति नभस्स्थलम् । क्षणं भ्रमति दिक्कुञ्जे तृष्णा हृत्पद्मषट्पदी ॥२४ सर्वसंसारदुःखानां तृष्णैका दीर्घदुःखदा । अन्तःपुरस्थमपि या योजयत्यतिसंकटे ॥२५ तृष्णाविषूचिकामन्त्रश्चिन्तात्यागो हि स द्विज ॥२६ स्तोकेनानन्दमायाति स्तोकेनायाति खेदताम् । नास्ति देहसमः शोच्यो नीचो गुणविवर्जितः ॥२७ कलेबरमहंकारगृहस्थस्य महागृहम् । लुठत्वभ्येतु वा स्थैर्यं किमनेन गुरो मम ॥२८ षङ् क्तिबद्धेन्द्रियपशुं वलगत्तृष्णागृहाङ्गणम् । चित्तभृत्यजनाकीर्णं नेष्टं देहगृहं मम ॥२९ जिह्वामर्कटिकाक्रान्तवदनद्वारभीषणम् । दृष्टदन्तास्थिशकलं नेष्टं देहगृहं मम ॥३० हे मुने ! दुष्ट मूषकी जैसे वीणा के तार को काट डालती है, वैसे ही मेरी तृष्णा मेरे श्रेष्ठ गुणों को काट डालती है। यह तृष्णा चञ्चल बंदरिया के समान न साधने योग्य स्थान में भी अपना पांव टिकाने को