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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished572 pages

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११८ ] [ चतुर्थ अध्याय सर्वं प्रशान्तमिति शब्दमयी च दृष्टिर्बोधार्थमेव हि मुधैव तदोमितीदम् ॥१६ सर्वं किंचिदिदं दृश्यं दृश्यते चेज्जगद्गतम् । चिन्निष्पन्दांशमात्रं तन्नान्यदस्तीति भावय ॥२० नित्यप्रबुद्धचित्तस्त्वं कुर्वन् वाऽपि जगत्क्रियाम् । आत्मकत्वं विदित्वा त्वं तिष्ठाक्षुब्धमाब्धिवत् ॥२१ निदाघ की यह बात सुनकर उनके पिता ऋषिवर ऋभु कहने लगे—"पुत्र ! तुम ज्ञानियों में श्रेष्ठ हो । अब तुम्हारे लिये जानने योग्य कुछ भी नहीं है । तुम पर भगवान की ऐसी कृपा हुई है कि तुम स्वयं अपनी बुद्धि के द्वारा ही सब विषयों के ज्ञाता हो गये हो । फिर भी चित्त की मलीनता से जो भ्रम शेष रह गया है, उसे मैं दूर कर डालूँगा । शम, विचार, सन्तोष और सत्संग यह चारों मोक्ष द्वार के द्वारपाल कहे गये हैं। यदि उनमें से एक का भी आश्रय ग्रहण कर ले तो शेष तीनों स्वयं ही वश में हो जाते हैं । जगत के पाश से मुक्त होने की कामना हो तो शास्त्रों के अध्ययन, तप, दम तथा सत्संग के द्वारा अपनी प्रज्ञा- वृद्धि करे । अपने अनुभव से शास्त्र-प्रमाण एवं गुरु के उपदेश से निरन्तर अभ्यास द्वारा आत्मचिन्तन की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है । यदि तुमने संकल्प और आशा का अनुसंधान त्याग दिया है तो कैवल्य की प्राप्ति स्वयं ही हो गई होगी । चित्त अकर्तृत्व ही चित्त-वृत्तियों का निरोध कहा गया है । इसे ही कैवल्य अवस्था अथवा पराशान्ति कहते हैं । विश्व के सब पदार्थों में आत्म-भावना का भले प्रकार त्याग कर गूँगे, अंधे और बहिरों के समान रहने से ही यह सम्भव है । शब्दमयी वैभिन्नता युक्त दृष्टि नितान्त व्यर्थ है । एक है, अजन्मा है, आदि मध्य रहित तथा तेजोमय है इत्यादि शब्द रूप चिन्तन आत्मबोध में बाधा स्वरूप हैं । यह दिखलाई पड़ने वाला सम्पूर्ण प्रपंच तत्व रूप में प्रणव ही है । यहाँ जो कुछ दिखाई पड़ता है, वह चित्तविशेष में दिखाई पड़ता है । अतः