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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished572 pages

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१२६ ] [ चतुर्थ अध्याय चिद्रूपात्मक ही लगता है। इस प्रकार आत्मा जहाँ जिस रूप में उल्लास को प्राप्त होता है, वहाँ उसी रूप में अवस्थित होकर तद्रूप में स्थित हो जाता है। सुषुप्ति में विलीनावस्था को प्राप्त हुये स्वप्न की भाँति यह सम्पूर्ण स्थावर और जङ्गम दृश्य-जगत प्रलय काल में नष्ट हो जाता है। ज्ञानीजन इस आत्मा को परब्रह्म, सत्य स्वरूप तथा यज्ञ स्वरूप बतलाते हैं। जैसे कङ्कण शब्द की स्वर्ण से पृथक कुछ सत्ता नहीं है, वैसे जगत भी परब्रह्म है, उसकी पृथक् कोई सत्ता नहीं है । परब्रह्म ने ही अपने इस रूप को जगत रूप माया में परिवर्तित किया है । द्रष्टा जब दृश्य में अन्तर्भूत हो जाय तभी बन्धन हो जाता है। दृश्य के वशी- भूत होकर ही द्रष्टा बन्धन में पड़ता है और दृश्य के न होने पर ही मोक्ष है। संसार की 'तेरा-मेरा' रूप भाव वाली सृष्टि ही दृश्य है। संसार में सम्पूर्ण प्रपञ्च रूप माया मन के द्वारा ही प्रवृद्ध होती है । जब तक मानसिक कल्पना नष्ट नहीं होती, तब तक मुक्ति का मार्ग दिखाई नहीं देता। स्वयं आविर्भूत ब्रह्मा ने इस विश्व की मानसिक कल्पना द्वारा रचना की है। इस लिये यह दिखाई पड़ने वाला विश्व मनोमय ही समझना चाहिये । बाह्याभ्यन्तर कहीं भी यह मन सद्रूप में अनावस्थित है। विषयों का बोध होना ही मन कहा गया है । संकल्प ही मन का स्वरूप है क्योंकि वह संकल्प में ही रम रहा है। अतः संकल्प को ही मन समझना चाहिये । आज तक कोई भी संकल्प और मन को पृथक नहीं कर सका। सभी संकल्पों के विनष्ट होने पर आत्मस्वरूप ही शेष रहता है। विश्व 'मैं' और 'तू' इत्यादि इस दिखाई पड़ने वाले प्रपञ्च के प्रशान्त होने पर जब दृश्य का परतत्व हो जाता है तभी कैवल्य की प्राप्ति मानी जाती है। महाप्रलय काल में जब दृश्य में सत्ता का अभाव हो जाता है, तब केवल शान्त आत्मा ही अवस्थित रहता है। जो आत्मरूपी सूर्य अस्त को कभी प्राप्त नहीं होता तथा जो सब दोषों से परे, देव स्वरूप है, जिसमें जाकर वाणी लौट जाती है, उस सर्वकर्त्ता और सर्व रूप के ज्ञाता मुक्त पुरुष ही है । जिनकी आत्मा एवं रूपों की