१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
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Read in context१२८ [] [ चतुर्थ अध्याय गमन करने पर जो मध्य में चित्त का व्यवधान है, उसके निमेष से चिदाकाश ही शेष रहता है । उसी चिदाकाश में समस्त संकल्पों को सत्ताहीन करके स्थित होने पर सर्वात्मक शान्त पद की प्राप्ति हो जाती है । चिदाकाश में अवस्थित होने पर उदारता और वैराग्य से सम्पन्न सर्वानन्दमयी अवस्था की उपलब्धि ही समाधि कही जाती है । उस समय दृश्य पदार्थों की शून्यता का बोध होने पर राग-द्वेषादि दोषों के नष्ट होने पर समाधि अवस्था प्राप्त होती है । उस समय अभ्यास की शक्ति से एकाग्र चित्त में रमण करने की क्षमता उत्पन्न हो जाती है । दृश्य की सत्ता के अभाव का बोध ही ज्ञान है । उसे ही चिदात्मक ज्ञेयत्व कहते हैं । उसे ही आत्म कैवल्य मानना चाहिये, उससे भिन्न सब प्रपंच मिथ्या हैं। जैसे एक धूलिकण के बिल में मच्छरों का सिंहों के साथ युद्ध करना सम्भव नहीं है और मदोन्मत्त ऐरावत का सरसों के एक कोण छिद्र में बांधा जाना सम्भव नहीं है तथा कमल की पंखुड़ी में स्थित सुमेर का भ्रमर के बालक द्वारा निगला जाना मिथ्या गाथा है, वैसे ही यह विश्व अस्तित्व में नहीं आ सकता, इसकी सत्ता भ्रमात्मक है । राग-द्वेष आदि से दोषयुक्त हुआ चित्त ही संसार रूप है, उसके दोषों से मुक्त हो जाने पर ही मोक्ष की प्राप्ति होना कहा जाता है । मन जब देह की भावना करता है तब आत्मा देहात्मक बनता है और जब देह रूप वासना का लोप हो जाता है, तब वह देह धर्म से लिप्त नहीं होता । मन ही कल्प को क्षण तथा क्षण को कल्प बना देता है । अतः मेरे विचार से यह विश्व मन की कल्पना मात्र ही है ॥५८-६८॥ नाविरतो दुश्चरितान्नाशांतो नासमाहितः । नाशांतमानसो वाऽपि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥६६ तद्ब्रह्मानन्दमद्वन्द्वं निर्गुणं सत्यचिद्धनम् । विदित्वा स्वात्मनो रूपं न बिभेति कदाचन ॥७० परात् परं यन्महतो महान्तं स्वरूपतेजोमयमशाश्वतं शिवम् ।