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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished572 pages

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१३० ] [ चतुर्थ अध्याय जो मनुष्य एकाग्रचित्त अथवा शान्त मन वाला नहीं है तथा जो विपरीत आचरण में विरक्त नहीं हुआ है, उसे आत्मबोध कभी नहीं हो सकता। उत्कृष्ट कैवल्य ज्ञान ही आत्मसाक्षात्कार का एकमात्र साधन है। उस निर्गुण, सत्यस्वरूप, द्वन्द्वातीत चिद्घन और आनन्दमय ब्रह्म को अपना ही रूप मान लेने वाला पुरुष कभी भयभीत नहीं होता। "मैं वह ब्रह्म हूँ जो सदा देवताओं का भी उपास्य देव है, जो श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठतर, महान से भी महान, शाश्वत, कल्याणमय, परमतेजोमय, सर्वज्ञ, सनातन एवम् पुराण पुरुष है।" इस प्रकार की भावना ही मोक्ष प्राप्ति का श्रेष्ठ कारण है। ममता बन्धन का कारण है और ममता का परित्याग ही मोक्ष है। यही दो कारण प्राणी के लिये बन्धन अथवा मुक्ति स्वरूप हैं। ब्रह्म संकल्प से लेकर संकल्प त्याग पर्यन्त यह सम्पूर्ण जड़चेतनात्मक सृष्टि की कल्पना ईश्वर ने की है और जाग्रत अवस्था से मोक्ष प्राप्ति पर्यन्त समस्त संसार प्राणी के द्वारा ही कल्पित हुआ है। कठोपनिषद् के अन्तर्गत त्रिणाचिकेतनाग्नि से श्वेताश्वर के योग पर्यन्त के ज्ञान का आधार ईश्वरीय भ्रान्ति है और चार्वाक के मत से लेकर कपिल को सांख्य सिद्धान्त तक की दार्शनिकता का आधार जीव की भ्रान्ति है। इसलिये जो पुरुष मुक्ति की कामना करता है, वह जीव और ईश्वर के वादविवाद में अपनी बुद्धि को भ्रमित न करे। उसे तो दृढ़तापूर्वक ब्रह्मतत्त्व का ही मनन करना चाहिये। ज्ञानी पुरुष वही है जो दिखाई देने वाले सम्पूर्ण विश्व को निर्विशेष चित् रूप मानता हो। शिव, ब्रह्मा और विष्णु भी वही है। विषयों का त्याग जितना दुर्लभ है, उतना ही दुर्लभ तत्त्वज्ञान प्राप्त करना है। सद्गुरु की कृपा के बिना सहजावस्था की प्राप्ति सम्भव नहीं है। जिसने अपनी बोधप्रद शक्ति को जगा लिया है और सब कर्मों का त्याग कर डाला है, ऐसा योगी स्वयं ही सहजावस्था को प्राप्त हो जाता है। जब तक इसमें किंचित भी भिन्नता रहती है, तब तक उसे भय ही भय है। सर्वमय सच्चिदानन्द के दर्शन की अभिलाषा हो तो ज्ञान के चक्षुओं से उनके दर्शन किये जा