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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished572 pages

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महोपनिषद् [ १६१

हाथ-पांव युक्त देह को ही इन्द्रिय बताते हैं। इस प्रकार सङ्कल्प और वासना की रस्सी में बँध जाने पर प्राणी दुःख-पास में फँस कर अधोगति को पाता है। जैसे रेशम बनाने वाला कीड़ा अपनी इच्छा से बन्धन में पड़ता है, वैसे ही शक्तिमय चित् घोर अहम्भाव को प्राप्त होकर बन्धन में पड़ जाता है। जंजीर में जकड़े हुये सिंह के समान अपने द्वारा ही कल्पित तन्मात्र रूपी पाश में रहकर यह चित्-शक्ति नितांत विवश हो जाती है। यह आत्मा ही कहीं अहंकार रूप से और कहीं चित् के नाम से जाना जाता है। उसे ही कहीं मन, कहीं बुद्धि और कहीं ज्ञान कहा गया है। वही कहीं क्रिया है, कहीं प्रकृति और मन कहा जाता है। इसे कहीं पुर्यष्टक और कहीं बन्धन कहा गया है। यह कहीं इच्छा है तो कहीं अविद्या। यही आशारूप पाश का निर्माता सम्पूर्ण जगत को वैसे ही धारण करता है, जैसे बिना फल का वट बीज वट के वृक्ष को धारण करता है ॥ ११४-१३३ ॥

चिन्तानलशिखादग्धं कोपाजगर चर्वितम् । कामाब्धिकल्लोलरतं विस्मृतात्मपितामहम् ॥१३४ समुद्धर मनो ब्रह्मन् मातङ्गमिव कर्दमात् । एवं जीवाश्चितो भावा भवभावनयाऽऽहिताः ॥१३५ ब्रह्मणा कल्पिताकारा लक्षशोऽप्यथ कोटिशः । संख्याऽतीताः पुरा जाता जायन्तेऽद्यापि चाभितः ॥१३६ उत्पत्स्यन्तेऽपि चैवान्ये कणौघा इव निर्झरात् । केचित् प्रथमजन्मानः केचिज्जन्मशताधिकाः ॥१३७ केचित् च्चासंख्यजन्मानः केचित् द्वित्रिभवान्तराः । केचित् किन्नरगन्धर्वविद्याधरमहोरगाः ॥१३८ केचिदर्केंदुवरुणास्यक्षाधोक्षपद्मजाः । केचिद्ब्राह्मणभूपालवैश्यशूद्रगणाः स्थिताः ॥१३९