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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished572 pages

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महोपनिषत् ] [ १७१ सबाह्याभ्यान्तरे देहे ह्यध ऊर्ध्वं च दिक्षु च । इत आत्मा ततोऽप्यात्मा नास्त्यनात्ममय जगत ॥१०॥ हे पाप-रहित ! अन्तर की आस्था और भाव रूप सम्पत्ति का त्याग करके, अपने यथार्थ रूप में इस संसार में विचरण करो और स्वयं की सर्वत्र अकर्त्ता मानो, ऐसा करने से अमृता नाम वाली समता ही अवशिष्ट रहती है। खेद और उल्लास यह दोनों हो मनुष्य द्वारा स्वयं उत्पन्न किये हुये हैं। ऐसा समझ लेने पर समता ही शेष रहेगी । समता की यथार्थ स्थिति के भले प्रकार धारण कर लेने पर फिर आवागमन का कारण समाप्त हो जाता है। अथवा कर्त्तव्याकर्त्तव्य का त्याग कर डालो और मन का पान कर अपने यथार्थ रूप में स्थित हो जाओ । अन्त में सबका त्याग कर समाधिस्थ हो जाओ । चेतन ही प्रकाशरूप है और वही अन्धकार बन जाता है, क्योंकि वही मानसिक संकल्प का रूप धारण कर लेता है, इसलिए वासना के कारण का मूल सहित त्याग करके आकाश के समान स्वच्छ और शान्त मन वाले बनो। मुक्त वही जो हार्दिक रूप से सब वासनाओं को त्याग देता है और किसी प्रकार की आकुलता को मन में नहीं टिकने देता । वह भ्रान्ति के वश में पड़ कर दसों दिशाओं में चक्कर काटते हुये द्रष्टव्य पदार्थों को देखने में समर्थ है। देह के बाहर-भीतर, ऊपर-नीचे सर्वत्र आत्मा है, उसके लिए यह विश्व अनात्ममय कभी नहीं होता । अपितु जो लोग प्रयत्नपूर्वक सदाचार में रत रहते हैं वे ज्ञानी पुरुष इस संसार सागर को सहज में ही तरने योग्य बना लेते हैं ॥१-१०॥ न तदस्ति न यत्राहं य तदस्ति न तन्मयम् । किमन्यदभिवाञ्छामि सर्वं सच्चिन्मयं ततम् ॥११॥ समस्तं खल्विदं ब्रह्म सर्वमात्मेदमाततम् । अहमन्य इदं चान्यदिति भ्रान्तिं त्यजनघ ॥१२॥