१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
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Read in context२५६ [CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri] योगकुण्डल्युपनिषत् मध्ये पश्चिमताणेन स्यात्प्राणो ब्रह्मनाडिगः ॥५२॥ पूर्वोक्तेन क्रमेणैव सम्यगासनमास्थितः । चालनं तु सरस्वत्याः कृत्वा प्राणं निरोधयेत् ॥५३॥ प्रथमे दिवसे कार्यं कुम्भकानां चतुष्टयम् । प्रत्येकं दशसंख्याकं द्वितीये पञ्चभिस्तथा ॥५४॥ विंशत्यलं तृतीयेऽह्नि पञ्चवृद्ध्या दिने दिने । कर्तव्यः कुम्भको नित्यं बन्धत्रयसमन्वितः ॥५५॥ जालन्धरबंध में कंठ का संकोचन वायु को रोकने के निमित्त किया जाता है, वह बंध पूरक के अन्त में करना होता है ॥ ५१ ॥ अधोभाग में मूलबंध द्वारा गुदा का आकुंचन करे और ऊपर से जालंधर बन्ध द्वारा कण्ठ का संकोचन करे और मध्य में पश्चिमतान(उड्डीयान) से प्राण को खींचे। इस प्रकार सब तरफ से रोका जाकर प्राण ब्रह्मनाड़ी (सुषुम्ना) में चढ़ता है ॥ ५२ ॥ जैसे पहले बतलाया गया है सम्यक प्रकार से आसन पर बैठकर सरस्वती का चालन करके प्राण का निरोध करना चाहिये ॥ ५३ ॥ प्रथम दिन चारों कुम्भकों को दस-दस बार करना चाहिए और दूसरे दिन पन्द्रह-पन्द्रह बार करना चाहिये। तीसरे दिन बीस-बीस करना चाहिये, इसी प्रकार प्रतिदिन पाँच-पाँच बढ़ाता जाय। इन कुम्भकों का अभ्यास प्रतिदिन तीन बन्ध सहित करना चाहिये ॥५४-५५॥ दिवा सुप्तिर्निशायां तु जागरादतिमैथुनात् । बहुसंक्रमणं नित्यं रोधान्मूत्रपुरीषयोः ॥५६॥ विषमासनदौषाश्च प्रयासप्राणचिन्तनात् । शीघ्रमूत्पद्यते रोगः स्तम्भयेद्यदि संयमी ॥५७॥ योगाभ्यासेन मे रोग उत्पन्न इति कथ्यते । ततोऽभ्यासं त्यजेदेवं प्रथमं विघ्नमुच्यते ॥५८॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi