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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished572 pages

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प्रथम अभ्यास ] [ २५६ यहाँ यह चन्द्रमा से उत्पन्न द्रव को सोख लेती है तथा प्राणवायु के वेग से रक्त और पित्त को सूर्य ग्रहण कर लेता है ॥ ७० ॥ यातेन्दुचक्रं यत्रास्ते शुद्धश्लेष्मद्रवात्मकम् । तन्न सिक्तं ग्रसत्युष्णं कथं शीतस्वभावकम् ॥७१ तथैव रभसा शुक्लं चन्द्ररूपं हि तप्यते । ऊर्ध्वं प्रहवति क्षुब्धा तदैव स्रवतेतराम् ॥७२ तस्यास्वादवशाच्चित्तं बहिष्टं विषमेषु यत् । तदेव परमं भुक्त्वा स्वस्थस्यात्मरतो युवा ॥७३ प्रकृत्यष्टकरूपं च स्थानं गच्छति कुण्डली । क्रोडीकृत्य शिवं याति क्रोडीकृत्य विलीयते ॥७४ इत्यधोध्वंरजः शुक्ले शिवे तदनु मारुतः । प्राणापानौ समौ याति सह जातौ तथैव च ॥७५ यह चन्द्र मंडल में जाकर वहाँ के द्रव पदार्थ को शोषण कर लेती है और उसे उष्ण कर देती है । तब वहाँ शीतलता कैसे रह सकती है ? ॥ ७१ ॥ यह चन्द्रमा के शुक्ल रूप को तप्त कर देती है और क्षुब्ध होती हुई ऊपर चढ़ती है ॥ ७२ ॥ इसके प्रभाव से जो चित्त पहले बाहरी पदार्थों में संलग्न रहता था, वह परमार्थ में लग कर आत्मानन्द का उपभोग करने लगता है ॥ ७३ ॥ इस प्रकार कुण्डलिनी अष्टधा प्रकृति को प्राप्त होकर शिव के साथ मिलती है और उसी के साथ लय को प्राप्त हो जाती है ॥ ७४ ॥ इससे अधोभाग का रज और ऊपर का शुक्ल मिलकर शिव में लीन हो जाते हैं, तथा प्राण और अपान भी उन्हीं में लीन हो जाते हैं, क्योंकि वे समान रूप से उत्पन्न होते हैं ॥ ७५ ॥ भूतेऽल्पे च मनोल्पे वा वाचके त्वतिवर्धते । धावयत्यखिला वाता अग्निमूषाहिरण्यवत् ॥७६ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi