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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished572 pages

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२७२ ] [ योगकुण्डल्युपनिषत् षट् चक्राणि परिज्ञात्वा प्रविशेत्सुखमण्डले । प्रविशेद्व वायुमाकृष्य तयैवोर्ध्वं नियोजयेत् ॥१२ एवं समभ्यसेद्वायुं स ब्रह्माण्डमयो भवेत् । वायुं बिन्दुं तथा चक्रं चित्तं चैव समभ्यसेत् ॥१३ समाधिमेकेन समममृतं यान्ति योगिनः । यथाऽग्निर्दारुमध्यस्थो नोत्तिष्ठेन्मथनं विना ॥१४ विना चाभ्यासयोगेन ज्ञानदीपस्तथा न हि । घटमध्यगतो दीपो बाह्ये नैव प्रकाशते ॥१५ भिन्ने तस्मिन्घटे चैव दीपज्वाला च भासते । स्वकायं घटमित्युक्तं यथा दीपो हि तत्पदम् ॥१६ गुरुवाक्यसमा भिन्ने ब्रह्मज्ञानं स्फुटीभवेत् । कर्णधारं गुरुं प्राप्य कृत्वा सूक्ष्मं तरन्ति च ॥१७ इन समस्त चक्रों का ज्ञान प्राप्त करके सुख मण्डल रूप सहस्र दल कमल में प्रवेश करे और प्राण को ऊर्ध्व भाग में खींचकर स्थित करे ॥ १२ ॥ इस प्रकार प्राण का अभ्यास करने से ब्रह्माण्ड में स्थित हो जाती है । प्राणवायु, बिन्दु, चक्र तथा चित्त का उचित रूप से अभ्यास करके योगीजन एक्य रूप की समाधि तक पहुँच जाते हैं, और अमृत पद को प्राप्त होते हैं । जिस प्रकार काष्ठ में अग्नि रहती है, पर घिसने के बिना वह प्रकट नहीं होती, उसी प्रकार सतत अभ्यास के बिना योग विद्या का दीपक भी प्रकाशित नहीं होता । अथवा जिस प्रकार घड़े के भीतर रखा हुआ दीपक बाहर प्रकाश नहीं कर सकता जब तक कि उस घड़े का भेदन न किया जाय, उसी प्रकार शरीर रूपी घट के भीतर रखे हुये ब्रह्मरूपी दीप का प्रकाश भी उस समय तक बाहर नहीं निकलता जब तक गुरु के उपदेश से इस घट का भेदन नहीं होता । इस प्रकार इस अपार सागर को पार करने का उपाय गुरु रूपी कर्णधार ही है ॥ १३-१७ ॥