१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
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Read in context.त्रिपुरोपनिषत् ] [ ५१३ यह धारण करती है। वृहत्तिथि—निमेष से लेकर कल्पान्त जो काल विशेष, पञ्चदशादिनित्या = पन्द्रह तिथियां, वार, नक्षत्रादि रूप, नित्य देवता भाव को प्राप्त पन्द्रह तिथियों के साथ वृहत्तिथिरूप सोलवें सहित पूर्वोक्त पहले बताये पुरमध्य = स्व अविद्यापद, आरोप आधार, ईश्वर रूप भी यही धारण करती हैं । इस प्रकार देवताओं के जिन स्वरूपों में जिस-जिस का मन लगता है उसी के आश्रय से चित्त शुद्धि द्वारा वह कृतकृत्य हो जाता है ॥१०॥ इन रूपों का ध्यान करने में अशक्तों के लिए अब ध्यानान्तर कहा जाता है = अथवा रवि, चन्द्र आदि के मण्डल से उत्पन्न, स्तन बिम्ब, एक मुख नीचे की ओर इस प्रकार उपलक्षित सर्वाङ्ग, सुन्दरी को देहत्रय रूप गुहा में स्थित परमेश्वर की कला कामरूप चिच्छक्ति का ध्यान करके मनुष्य कामना परिपूर्ण करके अपनी इच्छानुसार कामरूप हो जाता है। किन्तु काम्यफल जन्मादि का कारण होता है अतः त्रैवर्णिक मोक्षे- च्छुकों को काम्योपासना नहीं करनी चाहिए ॥११॥ इसी प्रकार अपने-अपने वर्णानुसार शूद्र आदि भी विधिवत् अपने भोज्यपदार्थों में आत्मोपभोग बुद्धि को छोड़कर प्रथम महानता का अर्पण कर तथा प्रसाद रूप लेकर पुण्यलोक में सिद्धि प्राप्त करते हैं ॥१२॥ इस प्रकार न करने वाले विषयासक्त अनेक इच्छाओं से भरे हुए मनुष्यों को सरस्वती विश्वमाता लक्ष्मी के सहित आदि शक्ति जो अरुणा अर्थात् गौरी वह ब्रह्ममात्र विद्या होकर उनका उपसंहार करती है उनसे सिद्धियों को छिपाती है, उन्हें नहीं देती, अपितु अज्ञान पाशों द्वारा बांधकर उन्हें संसार के महागर्त ( गड्ढे ) में डाल देती है और वह जन्म जन्मान्तरों इसी आवर्त्त में घूमते रहते हैं ॥१३॥ जो निष्काम बुद्धि से चिच्छक्ति का ध्यान करते हैं वह भी कृत- कृत्य हो जाते हैं। सकाम, निष्काम, जो भक्त समूह प्रवृत्ति निवृत्ति की प्रर्वतिका जो चिच्छक्ति तथा भग अर्थात् ऐश्वर्य, विद्या, यश, श्री, ज्ञान वैराग्ययुक्त जो भगवान् काम व ईश कामेश्वर वे दोनों चिद् सामान्यात्मा-