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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished572 pages

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( ५६ ) उस एक ही परमात्मा को विद्वान लोग अनेक नामों से वर्णन करते हैं।” एकं सन्तं बहुधा कल्पपन्ति । “उस एक ही अनेक रूपों में कल्पना की गई है।” सृष्टि स्थित्यन्तकरणीं ब्रह्मविष्णु शिवाभिधाम् । स संज्ञा यांति भगवानेक एक जनार्दनः । —विष्णु पुराण १।२।६६ “वह एक ही भगवान् सृष्टि का उत्पादन, पालन और संहार करता है। उसी के ब्रह्मा, विष्णु, महेश नाम हैं।” आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् —एतरेय १।१।१ “यह आत्मा एक ही था !” एकमेवाद्वितीयम् —छान्दोग्य ६।२।१ “वह एक ही है, दो नहीं।” एकैव सा महाशक्तिस्तया सर्वं भिदं ततम् । “वह एक ही महाशक्ति है। उसी से यह सारा विश्व आच्छादित है।” एक एव तदा रुद्रो न द्वितीयोऽस्ति कश्चन —शिव पुराण “तब ( सृष्टि के आदि में ) अकेला रुद्र ही था और कोई नहीं।” तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदुचंद्रमाः तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म ता आपः स प्रजापतिः —यजु० ३२।१