१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
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Read in context७२ ] [ योगचूड़ामणि उपनिषद् CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri प्राणापानवशो जीवो ह्यधश्चोर्ध्वं च धावति । वामदक्षिणमार्गाभ्यां चञ्चलत्वान्न दृश्यते ॥२८॥ रज्जुबद्धो यथा श्येनो गतोऽप्याकृष्यते पुनः । गुणबद्धस्तथा जीवः प्राणापानेन कर्षति ॥२९॥ प्राणापानवशो जीवो ह्यधश्चोर्ध्वं च गच्छति । अपानः कर्षति प्राणं प्राणोऽपानेन कर्षति ॥ ऊर्ध्वाधःसंस्थितावेतौ यो जानाति स योगवित् ॥३०॥ धनंजय वायु ऐसा सर्वव्यापी है कि मृत्यु के पश्चात् भी नहीं छोड़ता । इन समस्त नाड़ियों में जीव भ्रमण करता रहता है ॥२६॥ जिस प्रकार हाथ से फेंकी हुई गेंद इधर-उधर जाती रहती है, उसी प्रकार प्राण भी प्राण और अपान वायुओं के वेग से स्थिर नहीं रह पाता ॥२७॥ प्राण और वायुओं के वशीभूत होकर जीव ऊपर और नीचे दौड़ता रहता है और वाम तथा दक्षिण मार्गों से भी आता जाता है, पर गति में अधिक शीघ्रता होने से वह दिखाई नहीं देता ॥२८॥ जिस प्रकार रस्सी से बँधा हुआ श्येन (पक्षी) जाता है और पुनः खींच लिया जाता है, उसी प्रकार गुणों के बन्धन में पड़ा जीव प्राण और अपान वायुओं से खींचा जाता है ॥२९॥ प्राण और अपान की शक्ति से जीव निरन्तर ऊपर नीचे आता जाता है । अपान प्राण को खींचता है और प्राण अपान को खींचता है । जो योगवित् है वह इनके ऊपर नीचे जाने को समझता है ॥३०॥ हकारेण बहिर्याति सकारेण विशेत्पुनः ॥३१॥ हंसहंसेत्यमुं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा । षट्शतानि दिवा रात्रौ सहस्रण्येकविंशतिः ॥३२॥ एतत्संख्यान्वितं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा । Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi