१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
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Read in contextयोगचूडामणि उपनिषद् ] [ ८१ ओंकार का जप करना चाहिये ॥ ७१ ॥ ॐ नित्य, शुद्ध, बुद्ध, निर्विकल्प, निरञ्जन, नाम रहित, अनादि, मृत्यु स्वरूप, एक तुरीय, भूत, भविष्य-वर्तमान में अविच्छिन्न रहने वाला जो परब्रह्म है, उसी से स्वयं- ज्योति रूप पराशक्ति उत्पन्न हुई है। आत्मा से आकाश की उत्पत्ति हुई, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथिवी की उत्पत्ति हुई। इन पञ्च महाभूतों के पांच प्रति (स्वामी) सदाशिव, ईश्वर, रुद्र, विष्णु और ब्रह्मा हैं। इनमें से ब्रह्मा उत्पत्ति, विष्णु स्थिति और रुद्र प्रलय के करने वाले हैं। ब्रह्मा रजोगुण युक्त, विष्णु सतोगुण वाले और रुद्र तमोगुण वाले हैं। ब्रह्मा देवताओं से प्रथम उत्पन्न हुए। ब्रह्मा सृष्टि रचने के लिये, विष्णु सृष्टि का पालन करने के लिये, रुद्र नाश करने के लिये और चन्द्रमा भोगों के लिये सबसे पहले हुये। इनमें से ब्रह्मा से लोक, देव, तिर्यंक, नर और स्थावर की उत्पत्ति होती है। इनमें से मनुष्यों का शरीर पञ्चभूत से मिलकर बनता है। ज्ञाने- न्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, ज्ञान, विषय प्राण आदि पञ्च वायु, मन, बुद्धि, चित्त, अहङ्कार—ये सब स्थूल रूप में कल्पे हुये हैं और वह शरीर भी स्थूल प्रकृति का ही कहा जाता है। ये ही ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, ज्ञान, विषय, पञ्च वायु, मन, बुद्धि, सूक्ष्म रूप में 'लिंग' कहे जाते हैं। तीन गुणों से युक्त कारण है। इससे सबके तीन शरीर होते हैं। चार अवस्थाएं जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय हैं, जिनके अधिपति विश्व, तैजस, प्राज्ञ और आत्मा में चार पुरुष होते हैं। स्थूल का भोक्ता विश्व है, एकान्त का भोक्ता तैजस है, आनन्द का भोक्ता प्राज्ञ है और 'पर' सबका साक्षी रूप है ॥ ७२ ॥ प्रणवः सर्वदा तिष्ठेत्सर्वजीवेषु भोगतः । अभिरामस्तु सर्वासु ह्यवस्थासु ह्यधोमुखः ॥७३ अकारश्चोकारश्च मकारश्चेति त्रयो वर्णास्त्रयो वेदास्त्रयो