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अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

by महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी

DevanagariSanskritpublished540 pages

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प्रथमोऽङ्कः ६३

( शकुन्तला न किञ्चिदुक्त्वा प्रस्थितैव )

राजा-- ( आत्मगतम् ) आः कथं गच्छति । ( ग्रहीतुमिच्छन्निगृह्यात्मानम् ) अहो चेष्टाप्रतिरूपिका कामिजनमनोवृत्तिः । अहं हि—

'अनुयास्यन् मुनितनयां सहसा विनयेन वारितप्रसरः ।
स्थानादनुच्चलन्नपि गत्वेव पुनः प्रतिनिवृत्तः ॥ २८ ॥


विशिष्टं महाप्रभावमतिथिम् उज्झित्वा = अपहाय, परित्यज्य स्वच्छन्दतः = स्वैरम्, गमनं = श्रयाणम् । स्वच्छन्दतो गमनं न युक्तमित्यतो मा गा इति भावः ।

( शकुन्तला--न किञ्चित् = किमपि उक्त्वा = कथयित्वा प्रस्थिता = प्रचलिता एव )

राजा-- ( आत्मगतम् ) अतः कथं गच्छति = अहो किं याति ( ग्रहीतुं = धर्तुं इच्छन् = वाञ्छन् विनयाभिजात्यादिना आत्मानं = स्वं निगृह्य = निवार्य ) अहो, कामिजनस्य मनोवृत्तिः = चित्तवर्तनं कामिजनमनोवृत्तिः, चेष्टामनुरूपयति तच्छीला चेष्टाप्रतिरूपिका = चेष्टासदृशी ( भवति ) अहं हि = अयं जनो निश्चयेन---

अन्वयः---मुनितनयां सहसा अनुयास्यन् विनयेन पुनः वारितप्रसरः अहं स्थानात् अनुचलन्नपि गत्वा प्रतिनिवृत्त इव ( अस्मि ) ।

अनुयास्यन्निति । गन्तुं प्रयतमानां शकुन्तलामवलोक्य राजा दुष्यन्तो विवेकेनात्मानं निगृह्य स्वगतं विमृशति--मुनितनयां = ऋषिकन्यकां शकुन्तलां प्रति सहसा = अविचारितं, अनुयास्यन् = अनुगमिष्यन् विनयेन = दमेन पुनः = भूयः वारितप्रसरः वारितः = निरुद्धः प्रसरः = अनुयानात्मको वेगः यस्य स वारितप्रसरः = अवरुद्धवेगः अत एवाहं स्थानात् = विश्रामस्थानात् स्थितेर्वा अनुचलन्नपि = अनुतिष्ठन्नपि गत्वा = प्रस्थाय प्रतिनिवृत्तः = प्रत्यागत इव = एव जातोऽस्मीति मे प्रतिभातीत्यर्थः ।


( शकुन्तला बिना उत्तर दिये ही जाती है )

राजा—( मन ही मन ) है, यह तो जाती है ( इसे पकड़ना चाहता हुआ भी पुनः अपनी इच्छा को रोककर ) कामियों की मनोवृत्ति शरीर की चेष्टा के अनुरूप ही होती है। क्योंकि—

मैं ही मुनिकन्या=शकुन्तला के पीछे-पीछे जाना चाहता था, पर शिष्टाचार के अनुसार एका-एक रुक गया हूँ। यद्यपि मैं उठा नहीं हूँ, पर प्रतीत होता है कि इसके पीछे-पीछे जाकर लौट रहा हूँ ॥ २८ ॥

विशेष—जो व्यक्ति जितना ही संयमी होता है वह अपने मन को उतनी ही शीघ्रता से अपने वश में कर लेता है। जैसे राजा दुष्यन्त का मन भ्रान्ति के कारण शकुन्तला को अपने से दूर समझ कर पकड़ने को दौड़ा। किन्तु उन्होंने धैर्य के द्वारा उसे रोक लिया। मन के अनुसार उसकी चेष्टाएँ भी हुआ करती हैं। मन अत्यन्त वेग से शरीर के अन्दर-अन्दर सारी चेष्टाएँ कर लेता है। राजा दुष्यन्त अपने स्थान से उठे तक नहीं, किन्तु मन शकुन्तला को पकड़ कर पुनः संकोचवश उसे छोड़ दिया। अतः मन की बड़ी प्रबलता मानी गयी है। मर्यादाशील व्यक्ति मन ही मन अनुचित विषय का प्रसार रोक लेते हैं। दुष्यन्त ने शारीरिक व्यापार कुछ नहीं किया, परन्तु उन्हें प्रतीत हुआ कि मैं शकुन्तला को पकड़ने के निमित्त जाकर लौट आया।

यहाँ मुनिकन्या का प्रयोग बड़ा ही महत्वपूर्ण है जिससे राजा दुष्यन्त ने सोचा कि यह मुनि


पाठा०—१. स्थानादचलन्नपि ।