अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
by महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी
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सामान्यप्रतिपत्तिपूर्वकमियं दारेषु तदर्हस्या त्वया
भाग्यायत्तमत्तः परं न खलु वाच्यं वधूबन्धुभिः ॥ ४।१६
( ४ )
शुश्रूषस्व गुरून् कुरुप्रियसखीवृत्तिं सपत्नीजने
भर्तुर्विप्रकृतापि रोषणतया मा स्म प्रतीपं गमः ।
भूयिष्ठं भव दक्षिणा परिजने भाग्येष्वनुत्सेकिनी
यान्त्येवं गृहिणीपदं युवतयो वामा कुलस्याधयः ॥ ४।१७
कुछ लोग चार श्लोक इस प्रकार मानते हैं :—
( १ ) यास्यत्यद्य शकुन्तला० ( ४।५ )
( २ ) अस्मान् साधु विचिन्त्य० ( ४।१६ )
( ३ ) शुश्रूषस्व गुरून् ( ४।१७ )
( ४ ) अभिजनवतो भर्तुः श्लाघ्ये स्थिता गृहिणीपदे
विभवगुरुभिः कृत्यैस्तस्य प्रतिक्षणमाकुला ।
तनयमचिरात् प्राचीवार्कं प्रसूय च पावनं
मम विरहजां न त्वं वत्से ! शुचं गणयिष्यसि ॥ ४।१८
अथवा—
भूत्वा चिराय चतुरन्तमहीसपत्नी
दौष्यन्तिमप्रतिरथं तनयं निवेश्य ।
भर्त्रा तदर्पितकुटुम्बभरेण सार्धं
शान्ते करिष्यसि पदं पुनराश्रमेऽस्मिन् ॥ ४।१६
अभिज्ञानशाकुन्तल नामकरण का कारण
हस्तिनापुर के चक्रवर्ती राजा दुष्यन्त ने कुलपति कण्व की पोष्यपुत्री शकुन्तला से उनके आश्रम में ही गान्धर्वविधि से विवाह करके अपनी राजधानी को लौटते समय शकुन्तला को अपने नामाक्षरों से अङ्कित एक अंगूठी देकर कहा था कि प्रिये ! इसमें प्रति-दिन एक-एक अक्षर गिनना, जिस दिन अन्तिम अक्षर आयेगा उसी दिन तुमको लेने के लिए मेरा कोई विश्वासी व्यक्ति आयेगा, तब तुम मेरे पास आ जाना ।
उस समय महर्षि कण्व आश्रम पर उपस्थित नहीं थे । शकुन्तला के निमित्त शान्ति के लिए सोमतीर्थ गये हुए थे । आने पर जब उन्हें शकुन्तला के विवाह का समाचार मिला तब उन्होंने शकुन्तला को राजा के पास भेजवा दिया, किन्तु महर्षि दुर्वासा के शाप के कारण राजा उसे पहचान न सका । शकुन्तला ने राजा की दी हुई अंगूठी दिखाकर उसे बीते हुए वृत्तान्त का स्मरण दिलाना चाहा, किन्तु वह अंगूठी उसकी अंगुलि में नहीं थी, दैवात् मार्ग में शक्रावतार या शचीतीर्थ का वन्दन करते समय जल में गिर चुकी थी । निराश होकर शकुन्तला जब राजमहल से बाहर निकली तो, उसकी माँ मेनका अप्सरा ने, एक तेजोमयमूर्ति बनाकर उसे लेकर किंपुरुषवर्ष में, वर्तमान हेमकूट पर्वत पर महर्षि कश्यप के आश्रम पर रख दिया । बाद वहीं उसे सर्वदमन नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका पीछे भरत नाम पड़ा ।
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१ शा० भू०