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अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

by महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी

DevanagariSanskritpublished540 pages

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बढ़ा हुआ पैर उधर में ही रह जाता है। उस समय वह उस नदी की तरह न तो आगे बढ़ पाती है और न ही रुक पाती है जो अपने सम्मुख उपस्थित पर्वत की बाधा पाकर न बढ़ पाती है और न रुक पाती है—

तं वीक्ष्य वेपथुमती सरसाङ्गयष्टिः निक्षेपणाय पदमुद्धृतमुद्वहन्ती।
मार्गाचलव्यतिकराऽऽकुलितेव सिन्धुः शैलाधिराजतनया न ययौ न तस्थौ ॥

छन्दों के प्रयोग में कालिदास की दक्षता है। वे इन्द्रवज्रा, उपजाति, वंशस्थ, और अनुष्टुप् छन्दों के प्रयोग में सिद्धहस्त हैं। जहाँ मेघदूत में उन्होंने केवल मन्दाक्रान्ता छन्द से ही कमाल दिखा दिया है वहाँ रघुवंश में छन्दों की विविधता की निपुणता दिखाई पड़ती है।

संस्कृत साहित्य में नाटकों की सजीव तथा मूर्त परम्परा का अनुवर्तन महाकवि भास से होता है। नाटकों की निर्माणपरम्परा में भास के बाद महाकवि कालिदास का क्रम आता है। संस्कृत साहित्य के उपवन में कालिदास का समागम एक वसन्तदूत के रूप में माना गया है जिसके कारण उस उपवन का कोना-कोना पुष्पित हो उठता है। उन्होंने संस्कृत भाषा को वाणी दी, नये साज सजाए, नये भाव, नयी दिशाएँ, नये विचार और नयी-नयी पद्धतियाँ दीं। इसी प्रकार कविवर कालिदास सबसे बड़े नाटककार और सबसे बड़े महाकवि हैं। कालिदास के सम्बन्ध में विश्वकवि गोटे ने कहा है कि स्वर्ग एवं मर्त्य का जो मिलन है उसे कालिदास ने सहज ही सम्पादित कर दिया है तथा उन्होंने फूल को सहज भाव से फल के रूप से परिणत कर दिया है। मर्त्य की सीमा को उन्होंने इस प्रकार स्वर्ग से मिला दिया है कि बीच का व्यवहार किसी को दृष्टिगोचर नहीं होता।

नाटकों के क्षेत्र में महाकवि ने 'मालविकाग्निमित्र', 'विक्रमोर्वशीय' और 'अभिज्ञान-शाकुन्तल' इन कृतियों का प्रणयन किया है। नाटकीय नियमों की दृष्टि से कथानिर्वाह, घटनाक्रम, पात्र-योजना आदि सभी में उनके असाधारण कौशल की छाप है। शाकुन्तल उनकी अन्तिम कृति है, किन्तु उसकी गणना आज विश्व-साहित्य की पहली कृतियों में की जाती है। प्रेम और सौन्दर्य का ऐसा सरस, हृदयग्राही एवं मर्मस्पर्शी चित्रण अन्यत्र देखने को नहीं मिलता है। उनमें ओज के साथ मनोज्ञता और लघुत्व के साथ ही भावप्राञ्जलता का अद्भुत समन्वय विद्यमान है।

जन्माष्टमी, सं० २०३७ वि०
भारतीय साहित्य शोध संस्थान
वाराणसी

विनीत
डा० श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी

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