अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
by महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी
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प्रथम अङ्क
नाटक के आरम्भ में मङ्गलाचरण के बाद सूत्रधार अपनी पत्नी नटी से कहता है—आर्ये ! कविवर कालिदास द्वारा रचित अभिनव अभिज्ञानशाकुन्तल नामक नाटक का अभिनय करना है। यह महाराज विक्रमादित्य की सभा है, जिसमें बड़े-बड़े विशिष्ट विद्वान् उपस्थित हैं और ग्रीष्म ऋतु का आरम्भिक समय है। अतः इनके मनोविनोद के निमित्त कोई उत्तम गाना गाओ। यह सुन नटी एक गीत गाती है, जिस पर सूत्रधार कहता है—प्रिये ! तुम्हारे गीत ने मेरे हृदय को इस प्रकार आकृष्ट कर लिया है जैसे शिकारी राजा दुष्यन्त को मृग ने महर्षि कण्व के आश्रम की ओर खींच लिया है। इसके बाद दो वैखानस ब्रह्मचारियों ने आकर राजा को रोकते हुए कहा कि—राजन् ! यह आश्रम का मृग अवध्य है, आप इसे न मारें। इसपर राजा धनुष से बाण उतार लेते हैं। तब ब्रह्मचारियों ने आशीर्वाद दिया कि—महाराज ! आप विजयी बनें और आपको चक्रवर्ती पुत्र की प्राप्ति हो। यह सामने कुलपति कण्व का पुनीत आश्रम है। यदि आपके किसी कार्य में बाधा न हो तो आप कृपया यहाँ पधारें। और आतिथ्य सत्कार स्वीकार करें। अतिथि-सत्कार का भार शकुन्तला को सौंप कर वे सोमतीर्थ की यात्रा में गये हुए हैं। हम लोग समिद् और कुश लाने के लिए पास के जंगल में जा रहे हैं। तदनुसार राजा ने विनीत भाव से आश्रम में प्रवेश किया। प्रवेश करते समय शकुन की सूचना पर राजा कहते हैं—यह तो आश्रम का स्थान है, पर मेरी दाहिनी भुजा फड़क रही है। यहाँ इसका फल कैसे संभव होगा, या हो भी सकता है, क्योंकि होनी के द्वार सर्वत्र होते हैं। बाद राजा ने सखियों के साथ वृक्षों में जल देती हुई सुन्दरी शकुन्तला को देखा। बातचीत के प्रसंग में उन्हें सखियों से पता चला कि यह शकुन्तला कुलपति कण्व की पोष्य पुत्री है। उसकी माँ मेनका अप्सरा और पिता राजर्षि विश्वामित्र हैं। अब राजा को आशा हो चली कि शकुन्तला का पाणिग्रहण मेरे साथ हो सकता है क्योंकि यह वस्तुतः क्षत्रिय-कन्या है। इसके पहले ऋषिकुमारी होने के कारण आग के समान समझा था। अनन्तर दोनों एक दूसरे के प्रति आकृष्ट होते हैं। हँसमुखी सखी प्रियम्वदा शकुन्तला को छेड़ती है जिससे वह नाराज होती है। इस बीच एक जङ्गली हाथी के उत्पात से भयभीत होकर वे मुनिकन्याएँ अपने आश्रम में जाने को उद्यत हो जाती हैं और सखियाँ कहती हैं—राजन् आपके स्वागत किये बिना पुनः दर्शन देने को कहने में हमलोग संकुचित होती हैं इस पर राजा कहते हैं कि आप लोगों की मधुरवाणी से ही मैं सत्कृत हो गया। अनन्तर वे अपने निवास पर चली जाती हैं, शकुन्तला घूम-घूमकर राजा को देखती हुई रुकती जाती है तथा राजा दुष्यन्त आश्रम की रक्षा के लिए बढ़ते हैं और शकुन्तला के प्रति आकृष्ट होकर अपनी राजधानी में जाना स्थगित कर देते हैं।
द्वितीय अङ्क
आलसी विदूषक आखेटक से परेशान होकर उससे अपने को बचाना चाहता है और उसके दोषों का उद्घाटन करते हुए कहता है—दोपहर के समय भी कड़ी धूप में वृक्षों की विरल छाया में इस वन से उस वन में यह मृग, यह सूकर, यह शार्दूल कह कर दौड़ना