अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
by महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी
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इन्हें देखकर सखियाँ उनका स्वागत करती हुई कहती हैं—राजन् ! हम लोगों की यह प्रियसखी आप को देखकर मदन द्वारा इस अवस्था को पहुँचा दी गई है। अब आपही इसके जीवन के आधार रहे हैं। अतः आप ऐसा करें कि यह बन्धुजनों के लिए शोचनीय न हो। इस प्रकार कह करके एक मृग के बच्चे को उसकी माँ ने मिलाने के बहाने लता मण्डप से बाहर चली जाती हैं। सखियों के साथ बाहर जाने की चेष्टा करती हुई शकुन्तला को रोककर राजा अपने अभिलषित मनोरथ को सफल करते हुए आनन्द का अनुभव करने लगे।
इतने में ही शकुन्तला को पुकारती हुई गौतमी स्वास्थ्य लाभ के लिए दर्भोदक लेकर वहाँ उपस्थित होकर कहती है वत्से ! इस दर्भोदक से तुम्हारा स्वास्थ्य ठीक हो जायगा। अब साम हो चली कुटी पर चलें। बड़े दुःख से उसके पीछे-पीछे जाती हुई शकुन्तला ने कहा-लतावलय ! सन्तापहारक ! पुनः मिलने के लिए आज से अनुरोध करती हूँ इस प्रकार लतावलय के व्याज से राजा को संकेत कर गौतमी के साथ वहाँ से चली जाती है। इसके बाद राजा प्रिया-परिसुक्त लतामण्डप में बड़ी खिन्नता से कुछ देर बिताकर यज्ञ कर्म में संलग्न ऋषियों के सन्ध्याकालीन निशाचरों के भय को दूर करने के लिए प्रस्थित हो जाते हैं।
चतुर्थ अङ्क
पुष्प तोड़ती हुई प्रियम्वदा और अनसूया की आपसी बातचीत से मालूम पड़ता है कि शकुन्तला के साथ गान्धर्वविवाह और निर्विघ्न यज्ञ रक्षा का कार्य समाप्त हो जाने के कारण ऋषियों से आज्ञा लेकर राजा दुष्यन्त अपनी राजधानी को चला गया। वहाँ जाकर वह शकुन्तला का स्मरण करेगा या नहीं ? इधर शकुन्तला भी उसके विरह में रात-दिन उनका चिन्तन करती हुई कुटी के पास ही रहती है। राजा के बुलाने वाले दूत की प्रतीक्षा कर थक जाती है और सोच में पड़ी रहती है।
एकदिन प्रसिद्ध क्रोधी दुर्वासा मुनि भिक्षा के लिए आश्रम में आये। उस समय वहाँ शकुन्तला के अतिरिक्त कोई नहीं था। वे आवाज देते हैं दुष्यन्त के सोच में डूबी हुई शकुन्तला कुछ नहीं सुन पाती। इससे ऋषि आग-बबूला होकर शाप देते हुए क्रोध में कह कर चल देते हैं कि तू जिस पुरुष की चिन्ता में इस तरह मग्न है कि मेरी बात तक नहीं सुनती, वह पुरुष स्मरण दिलाने पर भी तुझे स्मरण नहीं कर सकेगा। इस हृदयविदारक शाप को सुन अनसूया ने अनुनय-विनय कर उन्हें मनाने के निमित्त प्रियम्वदा को भेजकर उनके आतिथ्यसत्कार के लिए आश्रम में आ जाती है। जब प्रियम्वदा ने चरण पड़कर बड़ा अनुनय-विनय किया तो ऋषि ने कहा—मेरा शाप तो व्यर्थ नहीं होगा, पर कोई आभरण दिखाने पर यह शाप निवृत्त हो जायेगा। ( उस समय सखियों ने इस दुःखद घटना को शकुन्तला से नहीं कहा, केवल अपने ही तक सीमित रखा । )
सखियाँ परेशान थीं कि शकुन्तला ने जो अपने मन से राजा दुष्यन्त के साथ अपना गान्धर्व-विवाह कर लिया है, उससे कुलपति को कैसे अवगत कराया जाय ? सौभाग्य से जब महर्षि कण्व ने सोमतीर्थ की यात्रा से लौटकर यज्ञशाला में प्रवेश किया तब आकाश वाणी ने उनको दुष्यन्त के साथ शकुन्तला के गान्धर्वविवाह की घटना से अवगत करा