अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
by महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी
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Read in contextप्रमुख पात्रों का चरित्र-चित्रण
राजा दुष्यन्त
राजा दुष्यन्त अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक के नायक हैं। जाति से ये चन्द्रवंशी क्षत्रिय हैं और इनमें धीरोदात्त नायक के सभी गुण वर्तमान हैं। इनकी चाल ढाल व्यवहार आदि आकर्षक हैं। इनका शरीर लम्बा चौड़ा तथा सुडौल है। इनके सम्पर्क में आने वाले सभी लोगों पर इनके व्यक्तित्व का प्रभाव पड़ता है। ये शूरवीर धार्मिक राजा हैं। शिकार खेलने में इनका मन खूब लगता है। इनकी वीरता की इतनी ख्याति है कि देवराज इन्द्र भी अपनी सहायता के निमित्त इन्हें बुलाते हैं। ये बड़े मधुरभाषी हैं, प्रियंवदा इनके मधुर भाषण की प्रशंसा करती है। ये अपने कुल की प्रतिष्ठा का हमेशा ध्यान रखते हैं तथा अपने पूर्वज महाराज पुरु के पावन आचरण से सदा प्रेरणा लेते रहते हैं। ये कोई ऐसा कार्य नहीं कर बैठते हैं जिससे इनके कुल की मर्यादा पर धब्बा लगे। इस प्रकार दुष्यन्त सर्वश्रेष्ठ गुणों के प्रतीक एवं आदर्श राजा हैं।
जिस समय राजा दुष्यन्त तपोवन में प्रवेश करते हैं उस समय उनके दक्षिण बाहु फड़कने से शुभ शकुन होता है। जैसे ही वे आगे बढ़ते हैं वैसे ही कलश लेकर वृक्षों में पानी डालने के लिए आती हुई तीन तापस कन्याओं को देखते हैं। उनमें वल्कल पहने हुए शकुन्तला को देखकर वे मन में सोचते हैं कि इस कृशाङ्गी का सुन्दर शरीर वल्कल के योग्य नहीं, फिर भी वल्कल से इसकी शोभा बढ़ गई है। सहज सुन्दरों को क्या अच्छा नहीं लगता ? क्योंकि सेवार से आवृत रहता हुआ भी कमल सुन्दर मालूम पड़ता है और चन्द्रमा में पड़ा कलंक भी उसकी शोभा बढ़ाता है—
सरसिजमनुविद्धं शैवलेनापि रम्यं मलिनमपि हिमांशोर्लक्ष्म लक्ष्मीं तनोति । इयमधिकमनोज्ञा वल्कलेनापि तन्वी किमिह मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम् ।। १।२०
राजा दुष्यन्त को नैतिक चरित्र के विषय में बड़ा आत्मविश्वास था। जब राजा की दृष्टि शकुन्तला के अङ्गों पर पड़ती है। इसके लाल-लाल ओठ अभिनव किसलयों की दीप्ति से स्पर्धा कर रहे हैं। दोनों भुजाएँ कोमल शाखाओं जैसी मनोहर प्रतीत हो रही हैं और नया यौवन लुभावने कुसुम के समान उसके अङ्गों में व्याप्त हो गया है इस रूपसौन्दर्य से राजा का मन चंचल हो जाता है।
महर्षि कण्व के आश्रम में प्रवेश के समय अनुपम सौन्दर्य से मण्डित शकुन्तला को देखकर उसके लावण्य-कान्ति पर मुग्ध होकर प्रशंसा करते हैं और उसे पाने के लिए लालायित हो जाते हैं, फिर भी उनका विवेक ब्राह्मण कन्या के प्रति आकृष्ट होने से रोकता है। उनके मन से विचार उठता है कि क्या यह सम्भव है कि यह महर्षि कण्व की ब्राह्मणेतर भार्या में उत्पन्न हुई हो ! शीघ्र ही निर्णय कर लेते हैं कि अथवा सन्देह करना व्यर्थ है, निश्चय ही यह क्षत्रियों के ग्रहण योग्य है, क्योंकि मेरा पवित्र मन इसे चाहता है। सन्देहास्पद विषयों में सदाचारियों के अन्तःकरण के विचार ही प्रमाण हुआ करते हैं। इस प्रकार दुष्यन्त का आत्मसंयम पर पूर्ण विश्वास था—