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अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

by महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी

DevanagariSanskritpublished540 pages

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गौतमी

गौतमी महर्षि कण्व की धर्मभगिनी हैं और तपस्या की प्रतिमूर्ति है। वह अत्यन्त सीधी सादी तपस्विनी है। उसके प्रभाव से आश्रम की व्यवस्था ठीक चलती है। सभी आश्रमवासी उसका आदर करते हैं। वह शकुन्तला को बड़ा प्यार करती है। शकुन्तला जब राजा दुष्यन्त के दर्शन से कामपीड़ित होकर मालिनी नदी के तट के समीपवर्ती एक लतामण्डप में शिलाफलक पर विराजमान होकर समय बिताती है तब उस बेचारी तपस्विनी गौतमी को क्या मालूम कि शकुन्तला किस खेल में अलमस्त है। वह शकुन्तला के शारीरिक ताप का समाचार सुनकर स्वस्थता के लिए तत्काल मन्त्रपूत दर्भोदक हाथ में लेकर उसके पास पहुँचती है उससे उसके शरीर पर सींच कर प्यार से पूछती है—बिटिया, तुम्हारे शरीर का सन्ताप क्या कुछ कम हुआ ? शकुन्तला कुछ लाभ होने का उत्तर देती है। उस वृद्धा तापसी के आने के पूर्व ही शकुन्तला की बीमारी की वास्तविक दवा राजा दुष्यन्त तो मिल ही गये हैं, किन्तु उस बेचारी को क्या पता। वह अपने उपचार से आराम का अनुभव करके शकुन्तला को साथ लेकर कुटी पर चली जाती है। उस वृद्धा तपस्विनी गौतमी के सदाचार और सद्व्यवहार का ही परिणाम है कि कुलपति कण्व जैसे महर्षि भी उसका समादर करते हुए शकुन्तला की विदाई के अवसर पर शार्ङ्गरव द्वारा दुष्यन्त को सन्देश देकर पूछते हैं कि इस विषय में गौतमी का क्या मत है?—कथं वा मन्यते गौतमी। इस पर गौतमी कहती है कि वधूजनों के लिए इतना ही उपदेश पर्याप्त है—बेटी ! इस अमृतोपदेश को स्मरण रखना—एतावानेव वधूजनस्योपदेशः। जाते एतद् खलु सर्वमवधारय। शार्ङ्गरव, शारद्वत तथा शकुन्तला के साथ हस्तिनापुर में दुष्यन्त के दरबार में उपस्थित हो राजा के समक्ष गौतमी जिस धैर्य एवं सरलता से अपना कर्तव्य निभाती है उससे पाठकों का हृदय प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। राजा दुष्यन्त शकुन्तला के साथ उसका भी अपमान करते हुए स्त्री समूह की निन्दा करते हैं, उन्हें धूर्त बतलाते हैं—

स्त्रीणामशिक्षितपटुत्वममानुषीषु संदृश्यते किमुत याः प्रतिबोधवत्यः ।
प्रागन्तरिक्षगमनात् स्वमपत्यजातमन्यैर्द्विजैः परभृताः खलु पोषयन्ति ॥ ५।२२

किन्तु तपस्विनी गौतमी शान्त और निर्विकार बनी रहती है। इससे इसकी समुद्र जैसी गम्भीरता पृथ्वी की भाँति सहनशीलता तथा मुनियों जैसी क्षमाशीलता व्यक्त होती है गौतमी के समान विशुद्ध पावनचरित भारतीय महिलाओं के लिए आदर्श का निदर्शन है।

सर्वदमन ( भरत )

अभिज्ञानशाकुन्तल के अनुसार देवताओं की माता अदिति तथा पिता महर्षि कश्यप के आश्रम हेमकूटपर्वत पर शकुन्तला के गर्भ से उसकी माता मेनका अप्सरा के पास सर्वदमन का जन्म हुआ था और वहाँ ही उसके जातकर्म आदि संस्कार सम्पन्न हुए। यह बचपन से ही बड़ा तेजस्वी एवं चञ्चल बालक था। शेर के बच्चों के साथ खेलता और जबरदस्ती उनका मुख दवा कर उनके दांत गिनता था।

जिस समय राजा दुष्यन्त इन्द्र के शत्रु दुर्जय नामक दैत्यगण को युद्ध में परास्त कर इन्द्र के रथ से अपनी राजधानी हस्तिनापुर लौट रहे थे उस समय वे मरीचिनन्दन महर्षि कश्यप के दर्शनार्थ रथ से उतर पड़े तथा इन्द्रसारथी मातलि दर्शन का अवसर जानने