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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र)

Source: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (origin)

DevanagariHindipublished173 pages

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सर्ग] हिन्दीटीकासहित १(३)

रामका सब चरित्र आश्चर्य रूप है, जो पचीस सहस्र रामायणमनुष्यलोकमें प्रतिष्ठित है ॥ ९ ॥ वह रामचरित्र मनुष्योंके समान वर्णन किया है उनमें सीतामाहात्म्य विशेष करके नहीं कहा है ॥ १० ॥

शृणुष्वावहितो ब्रह्मन्काकुत्स्थचरितं महत् । सीताया मूलभूतयाः प्रकृतेश्चरितं महत् ॥ ११ ॥ आश्चर्यमाश्चर्यमिदं गोपितं ब्रह्मणो गृहे । हिताय प्रियशिष्याय तुभ्यमावेदयामि तत् ॥ १२ ॥

हे ब्रह्मन् ! उस बड़े रामचरितको सावधान होकर सुनिये, जो मूलप्रकृति जानकीका चरित्र है ॥ ११ ॥ यह परम आश्चर्यरूप ब्रह्माजीके स्थानमें गुप्तरूप हैं, सो तुम हितकारी प्रिय शिष्यके निमित्त मैं वर्णन करता हूँ ॥ १२ ॥

जानकी प्रकृतिः सृष्टेरादिभूता महागुणा । तपःसिद्धिः स्वर्गसिद्धिर्भूतिर्मूर्तिमती सती ॥ १३ ॥ विद्याविद्या च महती गीयते ब्रह्मवादिभिः । ऋद्धिः सिद्धिर्गुणमयी गुणातीता गुणात्मिका ॥ १४ ॥

जानकी सृष्टिकी प्रकृति रूप आदिभूत महागुणसंपन्न है, तपकी सिद्धि स्वर्गकी सिद्धि ऐश्वर्यरूप मूर्तिमान् सती है ॥ १३ ॥ ब्रह्मवादी इसहीको विद्या अविद्यारूपसे गाते हैं, यही ऋद्धि सिद्धि गुणमयी गुणातीत गुणात्मिका है ॥ १४ ॥

ब्रह्मब्रह्मांडसंभूता सर्वकारणकारणम् । प्रकृतिर्विकृतिर्देवी चिन्मयी चिद्विलासिनी ॥ १५ ॥ महाकुण्डलिनी सर्वानुस्यूता ब्रह्मसंज्ञिता । यस्या विलसितं सर्वं जगदेतच्चराचरम् ॥ १६ ॥

ब्रह्म ब्रह्माण्डका इसहीसे सम्भव है, यही सर्व कारणकी कारण है, यही देवी प्रकृतिविकृतिस्वरूपा चिन्मयी चिद्विलासिनी है ॥ १५ ॥ यही सबही प्रगट करनेवाली महाकुण्डलिनी है, ब्रह्मसंज्ञा इसीकी है, यह चराचर जगत् इसीसे विलसित है ॥ १६ ॥

यामाधाय हृदि ब्रह्मन्योगिनस्तत्त्वदर्शिनः । विघट्टयंति हृद्ग्रंथिं भवंति सुख मूर्तिकाः ॥ १७ ॥ यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति सुव्रत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदा प्रकृति संभवः ॥ १८ ॥

हे ब्रह्मन् ? तत्त्वदर्शी योगी जिसको हृदयमें धारणकर हृदयकी अज्ञानग्रंथि नष्ट कर सुखी होते हैं ॥ १७ ॥ हे सुव्रत ! जब जब धर्मकी ग्लानि होती है, तब तब अधर्मके नष्ट करनेको प्रकृतिका सम्भव होता है ॥ १८ ॥