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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र)

Source: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (origin)

DevanagariHindipublished173 pages

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सर्ग हिन्दीटीकासहित (१४१)

ज्वालामालासहस्राढ्या देवदेवी मनोन्मनी ॥ उर्वी गुर्वी गुरुः श्रेष्ठा सगुणा षड्गुणात्मिका ॥ ६१ ॥ महाभगवती ३४० भव्या वसुदेवसमुद्भवा ॥ महेंद्रोपेंद्रभगिनी भक्तिगम्यपरायणा ॥ ६२ ॥ ज्वालामालासहस्राढ्या, देवदेवी, मनोन्मनी, उर्वी, गुर्वी, श्रेष्ठा, षड्-गुणात्मिका ॥ ६१ ॥ महाभगवती ३४० भव्या, वसुदेवसमुद्भवा, महेन्द्रोपेन्द्र-भगिनी, भक्तिगम्यपरायणा ॥ ६२ ॥

ज्ञानज्ञेया जरातीता वेदांतविषया गतिः ॥ दक्षिणा ३५० दहना बाह्या सर्वभूतनमस्कृता ॥ ६३ ॥ योगमाया विभावज्ञा महामोहा महीयसी ॥ सत्या सर्वसमुद्भूतिर्ब्रह्मवृक्षाश्रया ३६० मतिः ॥ ६४ ॥ ज्ञानज्ञेया, जरातीता, वेदान्तविषया, गति, दक्षिणा, ३५० दहना, बाह्या, सर्वभूतसे नमस्कृत ॥ ६३ ॥ योगमायाका विभाव जाननेवाली, सत्या, सबकी उत्पन्न करनेवाली, ब्रह्मवृक्षकी आश्रय करनेवाली ३६० मति ॥ ६४ ॥

बीजांकुरसमुद्भूतिर्महाशक्तिर्महामतिः ॥ ख्यातिः प्रतिज्ञा चित्सं-विन्महायोगेंद्रशायिनी ॥ ६५ ॥ विकृतिः ३७० शांकरी शास्त्री गंधर्वा यक्षसेविता ॥ वैश्वानरी महाशाला देवसेना गुहप्रिया ॥ ६६ ॥ बीज अंकुरकी उत्पत्तिका कारण, महाशक्ति, ख्याति, प्रतिज्ञा, चित्संवित्, महायोगेन्द्रशायिनी ॥ ६५ ॥ विकृति, ३७० शांकरी, शास्त्री, गन्धर्वा, यक्षसे सेवित, वैश्वानरी, महाशाला, देवसेना, गुहप्रिया ॥ ६६ ॥

महारात्री शिवानंदा शची ३८० दुःस्वप्ननाशिनी ॥ पूज्याऽपूज्या जगद्धात्री दुर्विज्ञेयस्वरूपिणी ॥ ६७ ॥ गुहांबिका गुहोत्पत्तिर्महापीठा मरुत्सुता ॥ हव्यवाहांतरा ३९० गार्गी हव्यवाहसमुद्भवा ॥ ६८ ॥ महारात्रि, शिवानन्द, शची ३८० दुःस्वप्ननाशिनी, पूज्या, अपूज्या, जगद्धात्री, दुर्विज्ञेयस्वरूपिणी ॥ ६७ ॥ गुहाम्बिका, गुहोत्पत्ति, महापीठा, मरुत्सुता, हव्यावाहान्तरा ३९० मार्गी, हव्यवाहसमुद्रवा ॥ ६८ ॥

जगद्योनिर्जगन्माता जगन्मृत्युर्जरातिगा ॥ बुद्धिर्माता बुद्धिमती पुरुषांतरवासिनी । ४०० ॥ ६९ ॥ तपस्विनी समाधिस्था त्रिनेत्रा दिविसंस्थिता ॥ सर्वेंद्रियमनोमाता सर्वभूतहृदिस्थिता ॥ ७० ॥ जगत्की योनी, जगत्की मृत्यु और जराका अतिक्रमण करनेवाली, बुद्धि, माता, बुद्धिमती, पुरुषान्तरवासिनी ४०० ॥ ६९ ॥ तपस्विनी, समाधिमें