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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र)

Source: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (origin)

DevanagariHindipublished173 pages

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सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (२९)

शंख चक्र आदि लिये दीप्तिमान् अठ्ठासी सहस्र मनोगमी महात्माओंसे सेवित ॥ ३७ ॥ हम और नारद तथा सनकादिक पापरहित और भी नाना प्रकारकी दिव्य स्त्रीजनोंसे सब ओरसे व्याप्त ॥ ३८ ॥

सेव्यमानोऽथ मध्ये वै सहस्रद्वारसंवृत्ते ॥ सहस्रयोजनायामे दिव्ये मणिमये शुभे ॥ ३९ ॥
विमाने विमले चित्रे भद्रपीठासने हरिः । लोककार्यप्रसक्तानां दत्त्वा दृष्टिं समास्थितः ॥ ४० ॥

और सेव्यमान सहस्र द्वारसे युक्त सहस्र योजनके लम्बे चौड़े दिव्य मणियोंसे जटित सुन्दर ॥ ३९ ॥ विमल चित्र विमानोंमें भद्रपीठ आसनके ऊपर लोककार्यमें लगे पुरुषोंपर दृष्टि देकर नारायण स्थित थे ॥ ४० ॥

तस्मिन्कालेऽथ भगवान्कौशिकाद्यैश्च संवृतः ॥ आगम्य प्रणिपत्याग्रे तुष्टाव गरुडध्वजम् ॥ ४१ ॥
ततोऽवलोक्य भगवान्हरिर्नारायणः प्रभुः ॥ कौशिकेत्याह संप्रीत्या तान्सर्वांश्च कथाक्रमम् ॥ ४२ ॥

उस समय भगवान् ब्रह्मा कौशिकादिसे युक्त भगवान् गरुडध्वजके समीप आकर उनकी स्तुति करने लगे ॥ ४१ ॥ तब भगवान् नारायण उनको देखकर उन सबसे सम्बोधन देकर सबसे यथाक्रम कहने लगे ॥ ४२ ॥

जयघोषो महानासीन्महाश्चर्यं समागते । ब्रह्माणमाह विश्वात्मा शृणु ब्रह्मन्नथोदितम् ॥ ४३ ॥
कौशिकस्य च ये विप्राः साध्यसाधनतत्पराः ॥ हिताय संप्रवृत्ता वै कुशस्थलनिवासिनः ॥ ४४ ॥

सब ओरसे जयघोष और महाआश्चर्य होने लगा और विश्वात्मा कहने लगे हे ब्राह्मण ! यह वृत्तान्त सुनो ॥ ४३ ॥ जो ब्राह्मण कौशिकके साध्य साधनमें तत्पर हैं जो कुशस्थलनिवासी उनके हितमें संवृत हुए हैं ॥ ४४ ॥

मत्कीर्तिश्रवणे युक्ता गानतत्त्वार्थकोविदाः ॥ अनन्यदेवताभक्ताः साध्या देवा भवंत्विमे ॥ ४५ ॥
मत्समीपे तथा ह्यस्य प्रवेशं देहि सर्वदा ॥ एवमुक्त्वा पुनर्देवः कौशिकं प्राह माधवः ॥ ४६ ॥

मेरी कीर्तिश्रवणमें युक्त गानतत्त्वके जाननेवाले वे अन्यदेवताभक्त साध्य देव कहलायेंगे ॥ ४५ ॥ और इनका प्रवेश सदा हमारे समीप रहेगा ऐसा कहनेपर फिर माधवने कौशिकसे कहा ॥ ४६ ॥