अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र)
Source: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (origin)
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अपाणिपादो जवनो ग्रहीता हृदि संस्थितः । अचक्षुरपि पश्यामि
तथाऽकर्णः शृणोम्यहम् ॥ ४९ ॥ वेदाहं सर्वमेवेदं न मां जानाति
कश्चन । प्राहुर्महान्तं पुरुषं मामेकं तत्त्वदर्शिनः ॥ ५० ॥
अपाणिपादवाला वेगवान् सबकुछ ग्रहण करनेवाला हृदयमें स्थित हूँ, विना नेत्रों देखता और विना कानके सुनता हूँ ॥ ४९ ॥ मैं इस सबको जानता हूँ और मुझे कोई नहीं जानता है, तत्वदर्शी मुझको एक महान् पुरुष कहते हैं ॥ ५० ॥
निर्गुणामलरूपस्य यत्तदैश्वर्यमुत्तमम् । यन्न देवा विजानंति
मोहिता मायया मम ॥ ५१ ॥ यन्मे गुह्यतमं देहं सर्वगं तत्त्वदर्शिनः ।
प्रविष्टा मम सायुज्यं लभंते योगिनोऽव्ययम् ॥ ५२ ॥
निर्गुण अमलरूप जो उत्तम ऐश्वर्य है जिसको मेरी मायासे मोहित हुए देवता भी मुझको नहीं जानते हैं ॥ ५१ ॥ जो मेरा गुह्यरूप सर्वगामी देह है उसमें तत्त्वदर्शी प्रवेश कर मेरे सायुज्यको प्राप्त होते हैं ॥ ५२ ॥
येषां हि न समापन्नमाया वै विश्वरूपिणी । लभन्ते परमं शुद्धं
निर्वाणं ते मया सह ॥ ५३ ॥ न तेषां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि ।
प्रसादान्मम ते वत्स एतद्वेदानुशासनम् ॥ ५४ ॥
जिनको यह विश्वरूपिणी माया नहीं लिपटी है वे मेरे साथ परम शुद्ध निर्वाणको प्राप्त होते हैं ॥ ५३ ॥ सौ करोड कल्पमें भी उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती, हे वत्स ! मेरी कृपासे ऐसा होता है यही वेदका अनुशासन है ॥ ५४ ॥
नापुत्रशिष्ययोगिभ्यो दातव्य हनुमन्क्वचित् । यदुक्तमेतद्विज्ञानं
सांख्ययोगसमाश्रयम् ॥ ५५ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदि काव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे
सांख्ययोगे नामैकादशः सर्गः ॥ ११ ॥
हे हनुमत् ! अपुत्र अशिष्य अयोगीको यह नहीं देनी चाहिये, जो यह मैंने सांख्ययोग मिश्रित ज्ञान आपसे वर्णन किया है ॥ ५५ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रा. वा. आदि. अद्भुत. ज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां
सांख्ययोगो नामैकादशः सर्गः ॥ ११ ॥