अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र)
Source: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (origin)
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Read in context(७८) अद्भुतरामायण [ चतुर्दश-
विनायक धर्मनेता है वहभी मेरी आज्ञासे वर्तता है, जो वेद जाननेवालोंमें श्रेष्ठ देवताओंके सेनापति प्रभु हैं ।। २७-।। वह स्कन्दभी प्रभुकी आज्ञामेंही वर्तते हैं, जो प्रजाओंके पति मरीच्यादि महर्षि हैं ।। २८ ।।
सृजंति विविधं लोकं परस्यैव नियोगतः ।। या च श्रीः सर्वभूतानां ददाति विपुलां श्रियम् ।। २९ ।। पत्नी नारायणस्यासौ वर्तते मदनुग्रहात् ।। वाचं ददाति विपुलां या च देवी सरस्वती ।। ३० ।।
विविधलोक नारायणकी आज्ञासेही रचते हैं, जो लक्ष्मी सब भूतोंको महाश्री देती है ।। २९ ।। वह नारायणकी पत्नी मेरी आज्ञासे वर्तती है, जो देवी सरस्वती विपुल वाणी देती है ।। ३० ।।
सापीश्वरनियोगेन चोदिता संप्रवर्तते ।। याऽशेष पुरुषाघोरान्नरकात्तारयत्यपि ।। ३१ ।। सावित्री संस्मृता देवी देवाज्ञानुविधायिनी ।। पार्वती परमा देवी ब्रह्मविद्याप्रदायिनी ।। ३२ ।। यापि ध्याता विशेषेण सापि मद्धच नानुगा ।। योजनंतो महिमानंतः शेषोऽशेषा ऽमरप्रभुः ।। ३३ ।। दधाति शिरसा लोकं सोऽपि देवनियोगतः ।। योऽग्निः संवर्तको नित्यं वडवारूपसंस्थितः ।। ३४ ।।
वहभी ईश्वरके नियोगसे प्रेरित हो वर्तती है जो अनेक पुरुषोंको नरकसे तारती है ।। ३१ ।। वह सावित्री देवी वशीभूत होतीहै जो पार्वती परमादेवी ब्रह्मविद्याकी विधान करनेवाली है ।। ३२ ।। ध्यान करनेवालोंको फल मेरेही आज्ञासे देती है जो अनन्त महिमावाले शेषजी देवाधिपति हैं।।३३।। वहभी देवदेवकी आज्ञासे पृथिवीको शिरपर धारण करते हैं जो नित्य संवर्तक अग्नि वडवारूपसे स्थित है ।। ३४ ।।
पिबत्यखिलमंभोधिमीश्वरस्य नियोगत ।। आदित्या वसवो रुद्रा मरुतश्च तथाश्विनौ ।। ३५ ।। अन्याश्च देवताः सर्वा मच्छासनमधिष्ठिताः ।। गंधर्वा उरगा यक्षाः सिद्धाः साध्याश्च चारणाः ।। ३६ ।।
वहभी ईश्वरहीकी आज्ञासे सब सागरको शोषता है, आदित्य वसु रुद्र मरुत अश्विनीकुमार ।। ३५ ।। और भी सब देवता मेरे शासनमें स्थित रहते हैं, गन्धर्व उरग यक्ष सिद्ध साध्य चारण ।। ३६ ।।
भूतरक्षःपिशाचाश्च स्थिताः शास्त्रे स्वयंभुवः ।। कलाकाष्ठानिमेषाश्च मुहूर्ता दिवसाः क्षणाः ।। ३७ ।। ऋत्वब्दमासपक्षाश्च स्थिताः शास्त्रे प्रजापते ।। युगमन्वंतराण्य्येव ममतिष्ठंति शासने । ३८।