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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र)

Source: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (origin)

DevanagariHindipublished173 pages
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( ११८ ) अद्भुतरामायण [ द्वाविंशो-

नष्टरूपश्च परुषो मंदरश्मिर्दिवाकरः॥अदृश्यत कबन्धांकः समेतो धूमकेतुना ॥ २७ ॥ ऋक्षाश्वरवनिर्घोषा गगने पुरुषाधमाः ॥ औत्पातिकानि नर्दतः समंतात्परिचक्रमुः ॥ २८ ॥

उस समय नष्टरूप पुरुष और मन्द किरणोंवाला सूर्य हो गया और धूमकेतुके सहित कबन्ध दीखने लगा ॥ २७ ॥ आकाशमें नक्षत्रोंका तीक्ष्ण शब्द होने लगा, सब ओरसे उत्पात दीखने लगे ॥ २८ ॥

रामोऽपि बद्ध्वा भ्रुकुटिं क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ क्रोधं चकार सुभृशं निर्द्दहन्निव राक्षसम् ॥ २९ ॥ तस्य क्रुद्धस्य वदनं दृष्ट्वा रामस्य धीमतः ॥ सर्वभूतानि वित्रसुः प्राकंपत मही तदा ॥ ३० ॥

रामचन्द्रभी भौंह चढ़ाये क्रोधसे लालनेत्र किये राक्षसको जलाते हुएके समान क्रोध करते हुए ॥ २९ ॥ उन क्रोध किये रामचन्द्रका मुख देखकर सब भूत घबड़ा गये और पृथिवी कंपित होगई ॥ ३० ॥

सिंहशार्दूलमाच्छैलः प्रजज्वालाकुलद्रुमः ॥ बभूव चातिक्षुभितः समुद्र इव १पर्वसु ॥ ३१ ॥ लंकायां रावणवधे यं प्रायुंक्त शरं प्रभुः ॥ जग्राह तं शरं दीप्तं निःसंतमिवोरगम् ॥ ३२ ॥

सिंह शार्दूलके सहित पर्वत और कुलवृक्ष जल उठे और पर्वतमें सागरके समान समुद्र क्षुभित होगये ॥ ३१ ॥ लंकामें रावण वधके निमित्त जो बाण प्रभुने चलाया था, उसी बाणको श्वास लेते सर्पके समान ॥ ३२ ॥

यमस्मै प्रथमं प्रादादगस्त्यो भगवानृषिः ॥२ब्रह्मदत्तं महाबाणं यमाह युधि तद्वधे ॥ ३३ ॥ ब्रह्मणा निर्मितं पूर्णमिंद्राद्यैरमिततेजसा ॥ दत्तं सुरपतेः पूर्वं त्रैलोक्यजयकांक्षिणः ॥ ३४ ॥

प्रभुने ग्रहण किया, वह ब्रह्मदत्त महाबाण अगस्त्यजीने दिया था, युद्धमें उसके वधको ग्रहण किया ॥ ३३ ॥ वह महातेज द्वारा ब्रह्माका निर्माण किया था, इन्द्रादिके तेज उसमें विद्यमान थे, त्रिलोकी जयकी इच्छा करनेवाले इन्द्रके निमित्त वह बाण दिया गया था ॥ ३४ ॥


१ पर्वस्विवेतिसम्बन्धः । २ यं महाबाणं ब्रह्मदत्तं प्राहैत्यन्वयः । युधितद्वधनिमित्तं ब्रह्मणा निर्मितमिति

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (११६)

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सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (११६)

यस्य वाजेषु पवनःफले पावकभास्करौ ।। शरीरमाकाशमयं गौरवे मेरुमन्दरौ ।। ३५ ।। पर्वस्वपि च विन्यस्ता लोकपाला महौजसः ।। धनदो वरुणश्चैव पाशहस्तस्तथांतकः ।। ३६ ।। जिसके पंखमें पवन, फलमें अग्नि और सूर्य, आकाशमय शरीर, गुरुतामें मेरुमंदरके समान ।। ३५ ।। जिसकी ग्रंथियोंमें लोकपाल स्थित थे, कुबेर, वरुण, पाश हाथमें लिये यमराज ।। ३६ ।।

जाज्वल्यमानं वपुषा सपुंखं हेमभूषितम् ।। तेजसा सर्वभूतानां कृतं भास्करवर्चसा ।। ३७ ।। सधूममिव कालाग्निं दीप्यमानं रविं यथा ।। रथनागाश्ववृन्दानां भेदनं क्षिप्रकारिणम् ।। ३८ ।। शरीरसे प्रकाशमान सुवर्णके पंख बने सूर्यके समान तेजसे सब लोकका प्रकाश करनेवाला ।। ३७ ।। धूमयुक्त कालाग्निके समान, प्रकाशमें सूर्यके समान, रथ हाथियोंका शीघ्र भेदन करनेवाला ।। ३८ ।।

परिघाणां सहस्राणां गिरीणां चैव भेदनम् ।। नानारुधिरसिक्तांगं मेदोदिग्धं सुदारुणम् ।। ३९ ।। कालाभं सुमहानादं नानाशक्तिविना- शनम् ।। शत्रूणां त्रासजननं सपक्षामिव पन्नगम् ।। ४० ।। सहस्रों परिघ और पर्वतोंका भेदनेवाला अनेक रुधिरोंसे सिक्त, अंग मेदसे अच्छादित ।। ३९ ।। कालके समान, बडे शब्दसे अनेक शक्तियोंका नाश करनेवाला शत्रुओंका त्रास देनेवाला, पंखयुक्त सर्पके समान ।। ४० ।।

काकगृध्रबकानां च गोमायुवृकरक्षसाम् ।। नित्यं भक्ष्यप्रदं युद्धे राक्षसानां भयावहम् ।। ४१ ।। द्विषतां कीर्तिहरणं प्रकर्षकरमात्मनः ।। अभिमन्त्र्य ततो रामस्तं महेषुं महाभुजः ।। ४२ ।। काक, गृध्र, बक, गोमायु (शृगाल) भेडियों तथा राक्षसोंको नित्य भक्षका देनेवाला, राक्षसोंको भयदायक ।। ४१ ।। शत्रुओंकी कीर्तिका हरने- वाला अपनी उन्नति करनेवाले उस बाणको अभिमंत्रित कर रामचन्द्रने । ४२ ।।

वेदप्रोक्तेन विधिना कुण्डलीकृत्य कार्मुकम् ।। स रावणाय तं वेगाच्चिक्षेप शर मुत्तमम् ।।४३।। स सायको धनुर्मुक्त्तो हन्तुं रामेण रावणम् ।। धूमपूर्वँ प्रजज्वाल प्राप्य वायुपथं महान् ।। ४४ ।। वेदके कहे विधानसे धनुषपर चढाय रावणके ऊपर बडे वेगसे छोडा ।। ४३ ।। छोडा हुआ बाण प्रथम धूमयुक्त जल उठा और फिर वायुके मार्गको प्राप्त होकर चला ।। ४४ ।।

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( १३० ) अद्भुतरामायण [द्वाविंशति-

तं वज्रमिव दुर्धर्षं वज्रपाणिविसर्जितम् ॥ कृतांतकमिवावार्यं रावणो वीक्ष्य तत्पुरः ॥ ४५ ॥ हुंकृत्य किल जग्राह बाणं वामेन पाणिना ॥ ततस्तं जानुना कृष्य बभंज राक्षसाधिपः ॥ ४६ ॥

इन्द्रके हाथसे छोडे हुए वज्रके समान महादुर्धर्ष कालके समान निवारण करनेके अयोग्य उस बाणको देखकर रावण ॥ ४५ ॥ “हूँ” ऐसा शब्द कर वाम हाथसे वाण ग्रहण कर लेता हुआ, और जंघासे खेंचकर उसको तोड डाला ४६ ।

भग्ने तस्मिञ्छरे रामो विमना इव तस्थिवान् ॥ सहस्रकन्धरः क्रुद्धः क्षुरंप्रगृह्य साय कम् ॥ ४७ ॥ विव्याध रा*घवं वक्षः सर्वप्राणेन राक्षसः ॥ वक्षो निर्भिद्य स शरो रामस्य सुमहात्मनः ॥ ४८ ॥

उस वाणके भग्न होनेसे रामचन्द्र विमन होकर स्थित हुए; तब वह सहस्र-कंधर क्रोध कर तीक्ष्ण वाणको ग्रहण कर ॥ ४७ ॥ सम्पूर्ण बलसे रामचन्द्रकी छातीमें ताडन करता हुआ ॥ ४८ ॥

भित्त्वा महीं च सहसा पाताल तलमाविशत् ॥ ततो रामो महाबाहुः पपात पुष्पकोपरि ॥ ४९ ॥ निःसंज्ञो निश्चलश्चासीद्धाहा भूतानि चक्रिरे ॥ प्राकम्पत मही सर्वा सपर्वतवनाब्धिका ॥ ऋषयः कांदिशीकास्ते हा राम इति वादिनः ॥ ५० ॥

वह बाण रामचंद्रकी छातीको भेदन कर पृथिवी फाडकर पातालमें प्रवेश कर गया; तब महाबाहु राम मूर्च्छित हो पुष्पकमें गिरे ॥ ४९ ॥ निश्चल और अचेतन हो गये, सब प्राणी हाहाकार करने लगे, सब पर्वत और वनोंके सहित पृथिवी कंपित हो गई और हा राम ! इस प्रकारके शब्द ऋषिजन करने लगे ५०

दशशतवदनो जितारिरुग्रोरणशिरसि प्रननर्त सानुयात्रः ॥ गगन-तलगता निपतुरुल्काः प्रलयमिवापि च मेनिरे जनौघाः ॥ ५१ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तर कांडे रामस्वप्नायितं नाम द्वाविंशतितमः सर्गः ॥ २२ ॥

शत्रुका जीतनेवाला सहस्रमुखी रावण रणमें नृत्य करने लगा आकाशसे उल्कापात होने लगीं, सब प्राणियोंने जाना अब प्रलय हो जायगी ॥ ५१ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे ज्वालाप्रसादमिश्रकृत रामस्वप्नायितं नाम द्वाविंशतितमः सर्गः ॥ २२ ॥


* रावणं राघवसम्बन्धि ।

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१२१)

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सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१२१)

त्रयोविंशति सर्ग

जानकीद्वारा सहस्रमुखी रावणका वध

रामं तथाविधं दृष्ट्वा मुनयो भयविह्वलाः ।। हाहाकारं प्रकुर्वन्तः शांतिं जेपुश्च केचन ।। १ ।। तदा तु मुनिभिर्दृष्टा सीता प्रहसितानना ।। वसिष्ठप्रमुखाः सर्वे सीतां प्रोचुर्महर्षयः ।। २ ।।

रामचन्द्रको इस प्रकारका देख मुनि भयसे व्याकुल हो गये और कोई हाहाकार कर शान्तिपाठ करने लगे ।। १ ।। उस समय जानकीको हास्यमुख देखकर वसिष्ठ आदि ऋषि जानकीसे कहने लगे ।। २ ।।

सीते कथं श्रावितोऽयं रावणं राघव स्त्वया ।। समुत्पन्नो विपाकोऽयं घोरो जनकनंदिनि ।। ३ ।। क्व गता भ्रातरः सर्वे क्व गता वानरर्षभाः ।। मंत्रिणः क्व गता भद्रे रामस्य किमुपस्थितम् ।। ४ ।।

हे जानकी ! क्यों इस रावणकी वार्ता रामचन्द्रको सुनाई, इसीका घोर-फल रघुनन्दनको उपस्थित हुआ है ।। ३ ।। सब भाई और वानर जाने कहां गये, हे भद्रे ! सब मंत्री कहां गये, रघुनाथजीको यह क्या व्यसन उपस्थित हुआ है ।। ४ ।।

श्रुत्वैतद्वचनं तेषां मुनीनां भावितात्मनाम् ।। रामं तथाविधं दृष्ट्वा शयानं पुष्पकोपरि ।। ५ ।। पुंडरीकनिभे नेत्रे निमील्य रणमूर्द्धनि ।। आलिंग्य चोरसा सुप्तं प्रियामिव धनुः शरम् ।। ६ ।। नर्दन्तं राक्षसं चापि महाबलपराक्रमम् ।। साट्टहासं विनद्योच्चैः सीता जनकनंदिनी ।। ७ ।। स्वरूपं प्रजहौ देवी महाविकटरूपिणी ।। क्षुत्क्षामाच कोटराक्षी चक्रभ्रमितलोचना ।। ८ ।।

उन मुनियोंके इस प्रकारके वचन श्रवण कर और रामचन्द्रको पुष्पकपर मूच्छित देखकर ।। ५ ।। धनुष शर लिये मूच्छित रामको आलिंगन कर कमलकेसे नेत्रोंको रणस्थलमें मीचकर ।। ६ ।। महाबली पराक्रमी राक्षसको शब्द करता देखकर जनकनंदिनी सीता ऊँचे स्वरसे अट्टहास करके ।। ७ ।। वह महाविकट रूपवाली होकर अपना पूर्वरूप त्यागन करती हुई भूखसे व्याकुल कोटराक्षी चक्रके समान भ्रमित लोचन ।। ८ ।।

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(१२२) अद्भुतरामायण [त्रयोविंशति-

दीर्घजंघा महारावा मुंडमालाविभूषणा ॥ अस्थिकंकिणिका भीमा भीमवेगपराक्रमा ॥ ९ ॥ खरस्वरा महाघोरा विकृता विकृतानना, ॥ चतुर्भुजा दीर्घतुंडा शिरोऽलंकरणोज्ज्वला ॥ १० ॥

दीर्घजंघा महाशब्दवाली मुण्डमालाके भूषणोंवाली हड्डियोंकी क्षुद्रघण्टिका पहरे भीम वेग पराक्रमवाली ॥ ९ ॥ तीक्ष्ण शब्दवाली महाघोर विकृतमुखवाली चार भुजा दीर्घतुण्ड उज्ज्वल शिरके भूषण पहरे ॥ १० ॥

ललज्जिह्वा जटाजूटैर्मण्डिता चण्डरोमिका ॥ प्रलयांभोदकालाभा घंटापाशविधारिणी ॥ ११ ॥ अवस्कंद्य ॐ रथात्तूर्णं खड्गखर्परधारिणी ॥ श्येनीव रावणरथे पपात निमिषान्तरे ॥ १२ ॥

चलायमानजिह्वा जटाजूटसे मण्डित चण्डरोमवाली प्रलयसागर और कालके समान घंटापाशको धारण करनेवाली ॥ ११ ॥ पुष्पकसे शीघ्रतासे उतरकर खड्ग खर्पर धारण किये वाजिनीके समान रावणके रथपर टूट पडी ॥ १२ ॥

शिरांसि रावणस्याशु निमेषान्तरमात्रतः ॥ खड्गेन तस्य चिच्छेद सहस्राणीह लीलया ॥ १३ ॥ अन्येषां योद्धृवीराणां शिरांसि नखरेण हि ॥ भिन्ना निपातयामास भूमौ तेषां दुरात्मनाम् ॥ १४ ॥

एक निमेषमात्रमेंही लीलासे रावणके सहस्र शिर खड्गसे काट डाले ॥ १३। और भी वीर योध्दाओंके शिर नखोंसे तोड तोडकरं पृथिवीमें डाल दिये ॥ १४ ॥

केषांचित्पाटयामास नख कोष्ठानि जानकी ॥ खड्गेन चाच्छिनत्कांश्चित्क्रूरान्यादांश्च चिच्छिदे ॥ १५ ॥ खण्डं खण्डं चकारान्यांस्तिलशः कांश्चिदेव हि ॥ अन्त्राण्यन्यस्याचकर्ष पादाघातेन कांश्चन ॥ १६ ॥

किन्हींके कोष्ठ नखोंसे चीर डाले, किन्हींके चरण आदि अंग खड्गसे काट डाले ॥ १५ ॥ किन्हींके अंग खड्गसे तिलके वरावर काटकर चूर्णकर दिये, किसीको चरणाघात कर आंतें निकालकर खेंचन लगी ॥ १६ ॥

पार्श्वेन निजघानान्यान्याष्णिनान्यानपोथयत् ॥ कांश्चिच्छरीरवातेन दृष्ट्वाप्यन्यानपातयत् ॥ १७ ॥ प्रलयं कुर्वती सीता राक्षसानां भयंकरी ॥ निजघानाट्टहासेन कांश्चित्पृष्ठे द्विधाकरोत् ॥ १८ ।


* पुष्पादित्यर्थः । सम्पार पुष्पकं रथमित्यत्र पुष्पंके रथशब्द प्रयोगात् ।

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१२३)

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सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१२३)

पार्श्वभागसे इधर उधरके राक्षसोंको प्रहार करने लगी, किन्हींको शरीरकी पवनोंसे नष्ट करती हुई ॥ १७ ॥ वह राक्षसोंको भयदायक प्रलय करने लगी, किसीको अट्टहास कर पृष्ठभागसे दो टुकडे करती हुई ॥ १८ ॥

कांश्चित्केशांन्समाकृष्य निष्पिपेष महीतले ॥ सारथान्सगजान्सा-
श्वान्सगदासहतोमरान् ॥ १९ ॥ कांश्चिद्योधान्समाकृष्य मज्जया-
मास वारिधौ ॥ गले चोद्वेष्ट्य केषांचित्प्राणाञ्जग्राह जानकी ॥२०॥

किन्हींके केश पकडकर पीस डालती हुई रथ हाथी घोडे तोमरोंसहित ॥ १९ ॥ खैंचकर किसीको सागरमें डुबाती हुई, किसीका गला घोटकर जानकीने प्राण हरण कर लिये ॥ २० ॥

केषांचित्स्कंध आरुह्य शिरांस्युत्पाटितानि हि ॥ हुंकारेणाट्टहासेन
कांश्चित्प्राणानहापयत् ॥ २१.॥ कांश्चित्प्रचूर्ण्य वदनं पशुमारम-
मारयत् ॥ तान्सर्वान्निमिषेणैव निहत्य जनकात्मजा ॥ २२ ॥

किन्हींके कंधेपर कूदकर शिर तोड़ती हुई, किन्हींके प्राण अट्टहास और हुंकारसे हरण कर लिये ॥ २१ ॥ किन्हींके वदनको चूर्ण कर पशुओंके समान मार डाला. इस प्रकार एक निमेषमात्रमें जानकी उन सबको मारकर ॥ २२ ॥

तेषामंत्रेण शिरसां मालाभिः कृतभूषणा ॥ रावणस्य शिरांस्यु-
ग्राण्यादाय रणमूर्द्धनि ॥ २३ ॥ कंदुकक्रीडनं कर्तुं मनश्चक्रे मन-
स्विनी ॥ एतस्मिन्नंतरे तस्यां रोमकूपेभ्य उद्गताः ॥ २४ ॥

उनके शिरोंकी माला बनाकर धारण करती हुई और रणस्थलमें वे रावणके शिर लेकर ॥ २३ ॥ उनसे वह मनस्विनी गेंदका खेल करनेकी इच्छा करने लगी इसी अवसरमें उसके रोमकूपसे निकलकर ॥ २४ ॥

मातरो विकृताकाराः साट्टहासाः समाययुः ॥ सह कंदुकलीलार्थं
सीतया ताः सहस्रशः २५ ॥ तासां कासांचिदाख्यास्ये नामानि
शृणुसुव्रत ॥ याभिर्व्याप्तास्त्रयो लोकाः कल्याणीभिश्चराचराः । २६

विकृत आकारवाली माताएँ हँसती हुई प्राप्त हुईं, वह सहस्रों कंदुक क्रीडामें जानकीको सहायता देने लगीं ॥ २५ ॥ हे सुव्रत उनमें किन्हींके नाम मैं कहता हूं, जिन कल्याणियोंसे त्रिलोकी व्याप्त रही है ॥ २६ ॥

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(१२४) अद्भुतरामायण [ त्रयोविंशति-

प्रभावती विशालाक्षी पालिता गोनसी तथा ॥ श्रीमती बहुला चैव तथैव बहुपुत्रिका ॥ २७ ॥ अप्सुजाता च गोपाली बृहदंबालिका तथा ॥ जयावती मालतिका ध्रुवरत्ना भयंकरी ॥ २८ ॥
प्रभावती विशालाक्षी पालिता गोनसी श्रीमती बहुला बहुपत्रिका ॥ २७ ॥ अप्सुजाता गोपाली बृहदम्बालिका जयावती मालतिका ध्रुवरत्ना भयंकरी २८

वसुदामा सुदामा च विशोका नंदिनी तथा ॥ एकचूडा महाचूडा चक्रनेमिश्चटीतमा ॥ २९ ॥ उत्तेजनी जया सेना कमलाक्ष्यथ शोभना ॥ शत्रुंजया तथा चैव क्रोधना शलभी खरी ॥ ३० ॥
सुदामा वसुदामा विशोका नंदिनी एकचूडा चक्रनेमि चटीतमा ॥ २९ ॥ उत्तेजनी तया सेना कमलाक्षी शोभना शत्रुञ्जया क्रोधना शलभी खरी ॥ ३० ॥

माधवी शुभ्रवस्त्रा च तीर्थसेनी जटोज्ज्वला ॥ गीतप्रिया च कल्याणी कद्रुरोमामिताशना ॥ ३१ ॥ मेघस्वना भोगवती सुभ्रूश्च कनकावती ॥ अलाताक्षी वेगवती विद्युज्जिह्वा च भारती ॥ ३२ ॥
माधवी शुभ्रवस्त्रा तीर्थसेना जटा उज्ज्वला गीतप्रिया कल्याणी कद्रुरोमा अमिताशना ॥ ३१ ॥ मेघस्वना भोगवती सुभ्रू कनकावती अलाताक्षी वेगवती विद्युज्जिह्वा भारती ॥ ३२ ॥

पद्मावती सुनेत्रा च गंधरा बहुयोजना ॥ सन्नालिका महाकाली कमला च महाबला ॥ ३३ ॥ सुदामा बहुदामा च सुप्रभा च यशस्विनी ॥ नृत्यप्रिया परानन्दा शतोदूखलमेखला ॥ ३४ ॥
पद्मावती सुनेत्रा गंधरा बहुयोजना सन्नालिका महाकाला कमला महाबला ३३ सुदामा बहुदामा सुप्रभा यशस्विनी नृत्यप्रिया परामंदा शतोदूख-मलमेखरा ॥ ३४ ॥

शतघंटा शतानंदा आनन्दा भवतारिणी ॥ वपुष्मती चंद्रसीता भद्रकाली सटामला ॥ ३५ ॥ झंकारिकानिष्कुटिका रामा चत्वरवासिनी ॥ सुमला सुस्तनवति वृद्धिकामा जयप्रिया ॥ ३६ ॥
शतघंटा शतानन्दा आनन्दा भवतारिणी वपुष्मती चन्द्रसीता भद्रकाली सठामला ॥ ३५ ॥ झंकारिका निष्कुटिका रामा चत्वरवासिनी सुमला सुस्तनम्रती वृद्धिकामा जयाप्रिया ॥ ३६ ॥

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१२५)

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सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१२५)

धना सुप्रसादा च भवदा च जनेश्वरी ॥ एडी भेडी समेडी च वेतालजननी तथा ॥ ३७ ॥ कंदुतिः कंदुका चैव वेदमित्रा सुदेविका ॥ लम्बास्या केतकी चैव चित्र सेना चलाचला ॥ ३८ ॥

धनदा सुप्रसादा भवदा जनेश्वरी एडी समेडी भेडी वेतालजननी ॥ ३७ ॥ कंदुति कन्दु‌का वेदमित्रा सुदेविका लम्बास्या केतकी चित्रसेना चला अचला ३८

कुक्कुटिका शृंखलिका तथा शंकुलिका हडा ॥ कन्दालिका काकलिका कुंभिकाथ शतोदरी ॥ ३९ ॥ उत्क्राथिनी जवेला च महावेगा च कंकिनी ॥ मनोजवा कटकिनी प्रघसा पूतना तथा । ४० ।

कुक्कुटिका शृंखलिका संकुलिखा हडा कंदालिका काकलिका कुंभिका शतोदरी ॥ ३९ ॥ उत्क्राथिनी जवेला महावेगा कंकिनी मनोजवा कटकिनी प्रघसा पूतना ॥ ४० ॥

खेशया चातिद्रढिमा क्रोशनाथत दित्प्रभा ॥ मंदोदरी च तुंडीच कोटरा मेघवाहिनी ॥ ४१ ॥ सुभगा लंबिनी लंबा बहुचूडा विकत्थिनी ॥ ऊर्ध्ववेणीधरा चैव पिंगाक्षी लोहमेखला ॥ ४२ ॥

खेशया अतिद्रढिमा क्रोशना तडित्प्रभा मन्दोदरी तुंडी कोटरा मेघवाहिनी ॥ ४१ ॥ सुभगा लम्बिनी लम्बा वहुचूडा विकत्थिनी ऊर्ध्ववेणीधरा पिंगाक्षी लोहमेखला ॥ ४२ ॥

पृथुवक्त्रा मधुलिहा मधुकुंभा तथैव च ॥ यक्षाणिका मत्सरिका जरायुर्जर्जरानना ॥ ४३ ॥ ख्यातां डहडहा चैव तथा धमधमा द्विजा ॥ खंडखंडा पृथुश्रोणी पूषणामणि कुट्टिका ॥ ४४ ॥

पृथुवक्त्रा मधुलिहा मधुकुंभा यक्षणिका मत्सरिका जरायु जर्जरानना ॥ ४३ । ख्याता दहपहा धमधमा खण्डखण्डा पृथुश्रेणी पूषणा मणिकुट्टिका ॥ ४४ ॥

अम्लोचा चैव निम्लोचा तथा लंबपयोधरा ॥ वेणुदीणाधरा चैव पिंगाक्षी लोहमेखला ॥ ४५ ॥ शशोलूकमुखी दृष्ट्वा खरजंघा महाजरा ॥ शिशुमारमुखी श्वेता लोहिताक्षी विभीषणा ॥ ४६ ॥

अम्लोचा निम्लोचा पलोधरा वेणुवीणाधरा पिंगाक्षी लोहमेखला ॥ ४५ ॥ शशोलूकमुखी हृष्टा खरजंघा महाजरा शिशुरामुखी श्वेता लोहिताक्षी बिभीषणा ॥ ४६ ॥

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( १२६ ) अद्भुतरामायण [ त्रयोविंशति-

जटालीका कामचरी दीर्घजिह्वाबलोत्कटा ।। कालाहिकाया मालीका मुकुटामुकुटेश्वरी ।। ४७ ।। लोहिताक्षी महाकाया हवि- ष्पिण्डा च पिण्डिका ।। एकत्वचा सुकूर्म्मा च कुल्लाकर्णि च कर्णिका ।४८

जटालीका कामचारी दीर्घजिह्वा बलोत्कटा कालाहिका मालीका मुकुटा मुकुटेश्वरी ॥ ४७ ॥ लोहिताक्षी महाकाया हविष्पिण्डा पिण्डिका एकत्वचा सुकूर्मा कुल्लाकर्णी कर्णिका ॥ ४८ ॥

सुरकर्णी चतुष्कर्णी कर्णप्रावरणा तथा ।। चतुष्पथनिकेता च गोकर्णी महिषानना ।। ४९ ।। खरकर्णी महाकर्णी भेरीस्वनमहा- स्वना ।। शंखकुंभश्रवा चैव भगदा च महाबला ।। ५० ।।

सुरकर्णी चतुष्कर्णी कर्णप्रावरणा चतुष्पथ निकेता गोकर्णी महिषानना ॥ ४९ ॥ खरकर्णी महाकर्णी भेरीस्वना महास्वना शंखकुम्भश्रवा भगदा महाबला ॥ ५० ॥

गणा च सुगणा चैव कामदाप्यथ कन्यका ।। चतुष्पथरता चैव भूतितीर्थान्यगोचरा ।। ५१ ।। पशुदा विबुदा चैव सुखदा च महा- यशाः ।। पयोदा गोमहिषदा सुविशाला चतुर्भुजा ।। ५२ ।।

गणा सुगणा कामदा कन्यका चतुष्पथ रता भूतितीर्था अन्यगोचरा ॥ ५१ ॥ पशुदा विबुदा सुखदा महयशा पयोदा गोमहिषदा सुविशाला चतुर्भुजा ॥ ५२ ॥

प्रतिष्ठा सुप्रतिष्ठा च रोचमाना सुलोचना ।। नौकर्णी मुखकर्णी च विशिरा मंथिनी तथा ।। ५३ ।। एकवक्त्रा मेघरवा मेघवामा द्विरो- चना ।। एताश्चान्याश्च बहवो मातरः कोटिकोटिशः ।। ५४ ।।

प्रतिष्ठा सुप्रतिष्ठा रोचमाना सुलोचना नौकर्णी मुखकर्णी विशिरा मंथिनी ॥ ५३ ॥ एकमुखी मेघरवा मेघवामा द्विरोचना इसके सिवाय और भी अनेकों मातायें थीं ॥ ५४ ॥

असंख्याताः समाजग्मुःक्रीडितुं सीतया सह ।। दीर्घवक्ष्यो दीर्घदंत्यो दीर्घतुंड्यो द्विजोत्तम ।। ५५ ।। सरसा मधुराश्चैव यौवनस्थाः स्वलं- कृताः ।। माहात्म्येन च संयुक्ताः कामरूपधरास्तथा ।। ५६ ।।

वे असंख्य जानकीके साथ क्रीडा करनेको आई, दीर्घ वक्षस्थलवाली, दीर्घ दांतोंवाली, दीर्घनासिकावाली ॥ ५५ ॥ सरस मधुर यौवनमती स्वलंकृत- महिमासे संयुक्त कामरूपधारिणी ॥ ५६ ॥

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित ( १२७)

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सर्ग ] हिन्दीटीकासहित ( १२७)

निर्मांसगात्र्यः श्वेताश्च तथा कांचनसंनिभाः ॥ कृष्णमेघ- निभाश्चान्या धूम्राश्च द्विजपुङ्गव ॥ ५७ ॥ अरुणाभा महाभागा दीर्घकेश्यः सिताम्बराः ॥ ऊर्ध्ववेणीधराश्चैव पिंगाक्ष्यो लंब- मेखलाः ॥ ५८ ॥ निर्मांस गात्रेवाली, श्वेता, कांचनके समान, कृष्णमेघके समान कोई धूम्रवर्ण वाली ॥ ५७ ॥ अरुणाभा, महाभागा, दीर्घवालोंवाली, श्वेतवस्त्र पहरे, ऊर्ध्ववेणी धारे, पिंगाक्षी, लम्बायमान मेखला ॥ ५८ ॥

लंबोदर्यो लम्बकर्ण्यस्तथा लम्बपयोधराः ॥ ताम्राक्ष्यस्ताम्र- वर्णाश्च हर्यक्ष्यश्च तथापराः ॥ ५९ ॥ शत्रूणां विग्रहे नित्यं भय- दास्ता भवन्त्यपि ॥ कामरूपधराश्चैव जवे वायुसमास्तथा ॥ ६० ॥ लम्बे पेट, लम्बे कानवाली लम्बे पयोधरवाली, ताम्रवर्णके नेत्रवाली हर्यक्षी ॥ ५९ ॥ शत्रुओंके विग्रहमें नित्य भय देनेवाली होती हैं वे कामरूप धारिणी वेगमें वायुके समान हैं ॥ ६० ॥

शिरांसि रक्षसां गृह्य गंडशैलोपमान्यपि ॥ चिक्रीडुः सीतया सार्द्धं तस्मिन् रणधरातले ॥ ६१ ॥ मुंडमालाधराश्चैव काश्चिन्मुण्ड विभू- षणाः । रणांगणे महाघोरे गृध्रकंकशिवान्विते ॥ ६२ ॥ पर्वतशिखरके समान राक्षसोंके शिरको ग्रहण कर धरातलमें जानकीके साथ क्रीडा करने लगीं ॥ ६१ ॥ कोई मुण्डमाला धारण किये कोई मुण्डोंके भूषण पहरे महाघोर रणस्थल जो कि गृध्र कंक और गीदडोंसे युक्त था। ६२।

मांसासृक्पंकिले घोरे तत्र तत्र पुरोपमे ॥ ननर्त जानकी देवी घोर काली महाबला ॥ ६३ ॥ तदा चकंपे पृथिवी नौरिवानिलचालिता ॥ चेलुश्च भूधराः सर्वे समुद्राश्च चकंपिरे ॥ ६४ ॥ तथा मांस रुधिरके कीचसे युक्त उस पुरके समान उस रणस्थलमें महाकाली महाबला महाघोर जानकी देवी नृत्य करने लगी ॥ ६३ ॥ तब नौकाके समान चलायमान हो पृथिवी कंपित होने लगी, सब पर्वत चलायमान और सागर कंपित होगये ॥ ६४ ॥

स्वर्गिणां च विमानानि खात्पेतुर्भयतो द्विज ॥ सूर्यस्य दुद्रुवुर्भीता वाजिनो मुक्तरश्मयः ॥ ६५ ॥ यदा न सेहे जानक्याः भारं सोढुं वसुंधरा ॥ गंतुमैच्छत पातालं सीतापादाग्रपीडिता ॥ ६६ ॥

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(१२८) अद्भुतरामायण [ त्रयोविंशति

डरसे देवताओंके विमान आकाशसे गिरने लगे, सूर्यके घोडे मार्ग त्यागने लगे ॥ ६५ ॥ जब पृथ्वी जानकीका भार सहनेको समर्थ न हुई और सीताके चरणग्रसे पीडित हो पातालमें जाने लगी ॥ ६६ ॥

अट्टहासेन सीताया मातृणां हुंकृतेन च ।। प्रलयं मेनिरे लोकाः किमेतदिति विह्वलाः ॥६७॥ धरापातालगमनं वितर्क्य सुरसत्तमैः ।। संप्रार्थितो महादेवः स्वयमायाद्रणाजिरम् ॥ ६८ ॥

सीताके अट्टहास और मातृकाओंके हुंकारसे यह क्या हुआ इस प्रकार कहते लोक प्रलय मानने लगे ॥ ६७ ॥ देवता धराको पातालमें जाता देख महादेवसे प्रार्थना करने लगे, तब वे संग्रामस्थलमें आये ॥ ६८ ॥

जानक्याः पादविन्यासे शवरूपधरो हरः ।। आत्मानं स्तंभयामास धरणीधृतिहेतवे ॥ ६९ ॥ सर्वभारसहो देवः सीतापादतले स्थितः शवरूपो विरूपाक्षः स्थिताभूद्धरातदा ॥ ७० ॥

तब शवके समान रूप धारण कर शिव पृथ्वी थामनेको जानकीके नीचे स्थित हुए, और अपनेको स्थित किया ॥ ६९ ॥ सीताके पगतलमें स्थित हो देव सम्पूर्ण भार सहन करने लगे तब शवरूपधारी पृथ्वी स्तंभित हुई ॥ ७० ॥

तथाप्युपरिगा लोका न स्थातुं सेहिरे क्षणम् ।। सीतायाः पादशब्देन शिरसा हुंकृतेन च ।। निःश्वासवातसंघातैर्दुःस्थिता भूर्भुवादयः। ७१। धरणीतनयया यद्धीमनृत्यं धरण्यां कृतमिह मनसा तंर्त्तिचतयंतो द्विजेन्द्राः ।। जयति जयति सीतेत्याहुरिंद्रादिदेवाः सपदि भुवन भंगं मन्यमाना विषेदु ॥ ७२ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रा. वाल्मीकीये आदि. अद्भु. भाषाटीकायां सहस्रवदन-रावणवधो नाम त्रयोविंशतितमः सर्गः ।। २३ ।।

परन्तु ऊपरके लोक उस समय भी स्थित न हो सके, सीताके चरणशब्द और शिरके हुंकारसे तथा निश्वासकी पवनसे भूर्भवः स्व आदि लोक अस्वस्थ हो गये ॥ ७१ ॥ धरणीतनयाने जो भयंकर नृत्य पृथ्वीपर किया, उसके मनमें विचार करते द्विजेन्द्र इन्द्रादिक देवता जय जय करने लगे और संसार भंग होगा ऐसा मानने लगे ॥ ७२ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रा. वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे भाषाटीकायां सहस्रवदनरावणवधो नाम त्रयोविंशतितमः सर्गः ॥ २३ ॥

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१२९)

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सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१२९)

चतुर्विंशति सर्ग

देवतोंका रामको आश्वासन करना

संरंभवेगं सीताया वीक्ष्य ब्रह्मपुरो गमाः ॥ सलोकपालास्त्रिदशा ऋषिभिः पितृभिः सह ॥ १ ॥
प्रसादयितुमुद्युक्ताः सीतां ते तुष्टुवुः सुराः ॥ कृताञ्जलिपुटा देवाः प्रणम्य च पुनः पुनः ॥ २ ॥

तब सीताका इस प्रकार वेग और क्रोध देखकर लोकपाल देवता और पितर तथा ब्रह्माजी ॥ १ ॥ वे सीताके प्रसन्न करनेको युक्त हो उन्हें सन्तुष्ट करने लगे, देवता हाथ जोड वारवार प्रणाम कर ॥ २ ॥

ब्रह्माद्याः स्तोतुमारब्धाः सीतां राक्षसनाशिनीम् ॥ या सा माहेश्वरी शक्तिर्ज्ञानरूपायिलालसा ॥ ३ ॥
अनन्या निष्कले तत्त्वे संस्थिता रामवल्लभा ॥ स्वाभाविकी च त्वन्मूला प्रभा भानोस्तथामला ॥ ४ ॥

राक्षसनाशिनी जानकीकी ब्रह्मादिदेवता स्तुति करने लगे, जो यह माहेश्वरी शक्ति ज्ञानरूपा अतिलालसायुक्त है ॥ ३ ॥ यह रामवल्लभा अनन्य और निष्फल तत्त्वमें स्थित है. वह स्वाभाविकी शक्ति आपहीसे होती है, जैसे सूर्यकी कांति निर्मल होती है ॥ ४ ॥

एका सा वैष्णवी शक्ति रणे कोपाधिवेगतः ॥ परापरेण रूपेण क्रीडन्ती रामसन्निधौ ॥ ५ ॥
सेव्यं करोति सकलं तस्याः कार्यमिदं जगत् ॥ न कार्यं चापि करणमीश्वरस्येति निश्चयः ॥ ६ ॥

वह एकही वैष्णवी शक्ति रणमें बडे वेगसे और क्रोधसे परापररूप किये रामके निकट क्रीडा करती है ॥ ५ ॥ यही सब जगत् करके अपना कार्य करके विहरती है कि, ईश्वरको कार्य करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ ६ ॥

चतस्रः शक्तयो देव्याः स्वरूपत्वेन संस्थिताः ॥ अधिष्ठान वशादस्या जानक्या रामयोषितः ॥ ७ ॥
शांतिर्विद्या प्रतिष्ठा च निवृत्तिश्चेति ताः स्मृताः ॥ चतुर्व्यूहस्ततो देवः प्रोच्यते परमेश्वरः ॥ ८ ॥

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( १३० ) \qquad अद्भुतरामायण \qquad [ चतुर्विंशति

देवीकी चार शक्ति स्वरूपसे स्थित हैं अधिष्ठानके वशसे जानकी रामकी स्त्री हैं ॥ ७ ॥ शांति विद्या प्रतिष्ठा और निवृत्ति यह परमेश्वर देव चतुर्व्यूह रूपसे कहा जाता है ॥ ८ ॥

अनया परया देवः स्वात्मानंदं समश्नुते ॥ यत्त्वस्त्यनादिसंसिद्धमैश्वर्यमतुलं महत् ॥ ९ ॥ त्वत्संबन्धादवाप्तं तद्रामेण परमात्मना ॥ सैषा सर्वेश्वरी देवी सर्वभूतप्रवर्तिका ॥ १० ॥

इसी पराशक्तिसे देवका स्वात्मानन्द जाना जाता है, जो अनादिसंसिद्ध अतुल महत् ऐश्वर्य है ॥ ९ ॥ वही परमात्मा रामद्वारा तुम्हारे सम्बन्धसे प्राप्त किया जाता है, यह सर्वेश्वरी देवी सब भूतोंकी प्रवर्त्त करनेवाली है १०

त्वयेदं भ्रामयेदीशो मायावी पुरुषोत्तमः ॥ सैषा मायात्मिका शक्तिः सर्वाकारा सनातनी ॥ ११ ॥ वैश्वरूपं महेशस्य सर्वदा संप्रकाशयेत् ॥ अन्याश्च शक्तयो मुख्यास्त्वया देवि विनिर्मिता ॥ १२ ॥

तुमसेही यह मायावी पुरुषोत्तम भ्रमण कराये जाते हैं यह मायात्मिका शक्ति सर्वाकारा सनातनी है ॥ ११ ॥ यह महेश्वरका विश्वरूप सदा प्रकाशित करती है. हे देवि ! और भी मुख्य शक्ति तुमनेही निर्माण की है ॥ १२ ॥

ज्ञानशक्तिः क्रियाशक्तिः प्राणशक्तिरिति त्रयम् ॥ सर्वासामेव शक्तीनां शक्तिमन्तो विनिर्मिता ॥ १३ ॥ एका शक्तिः शिवोप्येकः शक्तिमानुच्यते शिवः ॥ अभेदं चानुपश्यंति योगिनस्तत्त्वदर्शिनः १४

ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति, प्राणशक्ति यह सम्पूर्णशक्ति और उनके शक्तिमान् निर्माण किये हैं ॥ १३ ॥ वास्तविक एकही शक्ति और एकही शक्तिमान शिव हैं, तत्त्वदर्शी योगी इनमें भेद नहीं मानते हैं ॥ १४ ॥

शक्तयो जानकी देवी शक्तिमन्तो हि राघवः ॥ विशेषः कथ्यते चायं पुराणे तत्त्ववादिभिः ॥ १५ ॥ भोग्या विश्वेश्वरी देवी रघूत्तमपतिव्रता ॥ प्रोच्यते भगवान्भोक्ता रघुवंशविवर्द्धनः ॥ १६ ॥

संपूर्ण शक्तियोंका स्वरूप जानकी देवी, शक्तिमान् राम हैं. तत्त्ववादियोंने पुराणोंमें यह विशेषतासे कहा है ॥ १५ ॥ रघुराजकी पतिव्रता देवी योग्या है, और रघुवंशविवर्द्धन भगवान् भोक्ता कहलाते हैं ॥ १६ ॥

मंता रामो मतिः सीता मन्तव्या च विचारतः ॥ एकं सर्वगतं सूक्ष्मं कूटस्थ मचलं ध्रुवम् ॥ १७ ॥ योगिनस्तत्प्रपश्यंति तव देव्याः परं पदम् ॥ अनंतमजरं ब्रह्म केवलं निष्कलं परम् ॥ १८ ॥

सर्ग ] · हिन्दीटीकासहित (१३१)

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सर्ग ] · हिन्दीटीकासहित (१३१)

मन्ता राम हैं और मति सीता है इनको विना विचारे मानना उचित है एकही सर्वगत सूक्ष्म अचल और ध्रुव हैं ।। १७ ।। योगी उसको देखते हैं वही देवीका परमपद है वह अनन्त अजर ब्रह्म केवल निष्कल और परे है ।। १८ ।।

योगिनस्तत्प्रपश्यन्ति तव देव्याः परं पदम् ।। सा त्वं धात्रीव परमा यानन्दनिधिमिच्छताम् ।। १९ ।। संसारतापानखिलान्हरसीश्वर-संश्रयात् ।। नेदानीं भूतसंहारस्त्वया कार्यो महेश्वरि ।। २० ।।

हे देवि ! आपके उस पदको योगी देखते हैं वह तुमही परमधात्री हो आनंदसागरकी इच्छा करनेवालोंको ।। १९ ।। ईश्वरके संश्रयसे संसारके संपूर्ण तापोंको दूर करती हो. हे महेश्वरि ! इस समय तुमको प्राणियोंका संहार न करना चाहिये ।। २० ।।

रावणो सगणं हत्वा जगतां सुखमाहितम् ।। किं पुनर्नृत्यकलया जगत्संह्रियते त्वया ।। २१ ।। एतच्छ्रुत्वाविशालाक्षी ब्रह्मणोऽभ्यर्थनं वचः ।। प्रीता सीता तदा प्राह ब्रह्माणं सहदैवतम् ।। २२ ।।

गणसहित रावणको मारकर जगत्को सुखी किया है फिर अब नृत्यके व्याजसे सब जगत्का संहार क्यों करती हो ।। २१ ।। वह विशाला श्रीब्रह्माजी-की यह प्रार्थना सुनकर प्रसन्न हो ब्रह्मादि देवतोंसे कहने लगी ।। २२ ।।

पतिर्मे पुंडरीकाक्षः पुष्पकोपरि राघवः ।। विद्धः क्षुरप्रेण हृदि शेते मृतकवत्प्रभुः ।। २३ ।। तस्मिन्नेव स्थिते देवाः किमिच्छामि जगद्धितम् ।। ग्रासमेकं करिष्यामि जगदेतच्चराचरम् ।। २४ ।।

हमारे पति कमललोचन राम पुष्पकविमान पर तीक्ष्ण बाणसे विद्ध हुए मृतकके समान सोते हैं ।। २३ ।। हे देवताओ ! उनके ऐसे होनेमें जगत्के हितकी किस प्रकार इच्छा कर सकती हूं, इस चराचर जगत्का एकही ग्रास कर जाऊंगी ।। २४ ।।

श्रुत्वैतद्वचनं देव्याः संरंभसहित सुराः ।। हाहाकारं प्रचक्रुस्ते संचचाल च मेदिनी ।। २५ ।। ततो ब्रह्मा सुरैः सार्द्धं पुष्पकं रथमा-स्थितम् ।। श्रीरामं ग्राहयामास स्मृतिं स्पृष्ट्वा स्वपाणिना ।। २६ ।।

संरम्भसहित देवता देवीके यह वचन सुनकर हाहाकार करने लगे, और पृथ्वी चलायमान होगई ।। २५ ।। तब ब्रह्माजीने देवताओंसहित पुष्पकमें स्थित श्रीरामको हाथसे स्पर्श कर स्मृति दिवाई ।। २६ ।।

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(१३२) अद्भुतरामायण [चतुर्विंशति-

उत्तस्थौ च महाबाहू रामः कमललोचनः ॥ रे रावण सुदुष्ट- स्त्वमद्य मद्बाणभेदितः ॥ २७ ॥ द्रक्ष्यस्याशु यमस्यास्यं भ्रुकुटी- भीषणाकृति ॥ ब्रुवन्नेवं धनुर्गृह्य ह्यपश्यन्त्रिदशान्पुरः ॥ २८ ॥

तब तत्काल महाबाहु राम उठ बैठे, और बोले अरे रावण ! तू आज मेरे बाणसे भेदित होकर ॥ २७ ॥ अवश्य भयंकर भौंवाले यमराजका मुख देखेगा, जब यह कहकर धनुष ग्रहण किया तब देवताओंको अपने सम्मुख स्थित देखा ॥ २८ ॥

नापश्यज्जानकीं तत्र प्राणेभ्योपि गरीयसीम् ॥ नृत्यतीं चापरां कालीमपश्यच्च रणांगणे ॥ २९ ॥ चतुर्भुजां चलज्जिह्वां खङ्गखर्पर- धारिणीम् ॥ शवरूपमहादेवहृत्संस्थां च दिगंबराम् ॥ ३० ॥

परन्तु प्राणप्यारी जानकीको वहां नहीं देखा युद्धस्थलमें नृत्य करती हुई महाकालीको देखा ॥ २९ ॥ और स्थितिके निमित्त शवरूपधारी महा-देवको देखा चार भुजा चलजिह्वा खड्गखर्परधारिणी जानकीको देखा ॥ ३० ॥

पिबन्तीं रुधिरं भीमां कोटराक्षीं क्षुधातुराम् ॥ जगद्ग्रासे कृतो- त्साहां मुण्डमालाविभूषणाम् ॥ ३१ ॥ भीमाकाराभिरन्याभिः क्रीडंतीं रणमूर्द्धनि ॥ मुण्डै राक्षसरांजस्य खेलंतीं कंदुकं मुदा ॥ ३२ ॥

वह कोटराक्षी महाभयंकर खङ्ग खर्पर धीरण किये दिगम्बर जगत्के ग्रासमें उत्साह करती मुण्डमालाके गहना पहरे ॥ ३१ ॥ और दूसरी भयंकर कन्दुक मूर्ति धारण किये हुए मृतकाओंके साथ रणभूमिमें क्रीडा करते देखा, और राक्षसराजके शिरके संग कन्दुक क्रीडा करते देखा ॥ ३२ ॥

प्रलयध्वांतधाराभां सदा घर्घरनादिनीम् ॥ अन्त्रमुण्डकरोटचक्ष- कृतमालां चलत्पदाम् ॥ ३३ ॥ कबन्धान्राक्षसानां च तया सह विनृ- त्यतः ॥ रथवाजिगजानां च शकलानि व्यलोकयत्यय् ॥ ३४ ॥

प्रलयकालके अन्धकारके समान सदा घर्घर शब्द करनेवाली आँते शिर हाथ नेत्रोंकी माला बनाये पद चलाती ॥ ३३ ॥ मृतक राक्षसोंके कबन्धोंके साथ नृत्य करती, रथ घोडे हाथियोंको टुकडोंको देखती हुई ॥ ३४ ॥

नैकोपि राक्षसो यत्र करपादशिरोयुतः ॥ कबन्धा ये च नृत्यंति तेषां पादाः प्रतिष्ठिताः ॥ ३५॥ कबन्धं रावणस्यापि नृत्यन्तं च व्यलोक- यत् ॥ तद्दृष्ट्वा मुमहाघोरं प्रेतराजपुरोपमम् ॥ ३६ ॥

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित ( १३३ )

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सर्ग ] हिन्दीटीकासहित ( १३३ )

कोई भी राक्षस हाथ पैर शिरसे युक्त नहीं था, जो कबन्ध नृत्य करते थे केवल उन्हींके चरण स्थित थे ॥ ३५ ॥ रावणका कबन्धभी नृत्य करते देखा वह स्थान महाघोर प्रेतराजके पुरके समान देखकर ॥ ३६ ॥

कालीं च वीक्ष्य नृत्यंतीं मातृभिः सहितां द्विज । पपात हस्ताद्रामस्य वेपताः सशरं धनुः ॥ ३७ ॥ भयाच्च निमिमीलाशुः रामः पद्मविलोचने ॥ इत्येवं विस्मितं दृष्ट्वा ब्रह्मोवाच रघूत्तमम् ॥ ३८ ॥

हे द्विज ! मातृकाओंके सहित महाभयंकर कालीको नृत्य करती देख कम्पित हुए रामके हाथसे धनुष बाण गिरपड़ा ॥ ३७ ॥ और डरसे रामचन्द्रने अपने दोनों कमलकेसे नेत्र मीच लिये. इस प्रकार विस्मित देखकर रामचन्द्रसे ब्रह्माजी कहने लगे ॥ ३८ ॥

त्वां दृष्ट्वा विह्वलं सीता क्रुद्धं चापि च रावणम् ॥ रथादवस्कन्द्य- सती पपात रणमूर्द्धनि ॥ ३९ ॥ भीमां च मूर्त्तिमालम्ब्य रोमकूपाश्च मातृकाः ॥ निर्माय ताभिः सहिता हत्वा रावणमग्रतः ॥ ४० ॥

जानकी आपको विह्वल और रावणको क्रुद्ध देखकर तत्काल युद्धस्थलमें विमानसे कूद पडी ॥ ३९ ॥ और उस भयंकर मूर्त्तिका अवलम्बन कर अपने रोमकूपसे मातृका उत्पन्न कर तनकें सहित क्रीडा कर रावणका वध किया । ४०

रक्षसां निधनं कृत्वा नृत्यंतीयं व्यवस्थिता ॥ अनया सहितो राम सृजस्यवसि हंसि च ॥ ४१ ॥ नानया रहितो राम किंचित्कर्तुमपि क्षमः ॥ इति बोधयितुं सीता चकार तद निंदिता ॥ ४२ ॥

अब यह राक्षसोंका वधकर व्यवस्थित हो नृत्य करती हैं, हे राम ! इनके सहित आप जगत् उत्पन्न कर नष्ट कर देते हैं ॥ ४१ ॥ हे राम ! इनके बिना आप कुछभी नहीं कर सकते हो यही दिखानेको जानकीने यह कार्य किया है ४२

पश्यैतां जानकीं राम त्यज भीतिं महाभुजा ॥ निर्गुणां सगुणां साक्षात्सदसद्यक्तिवर्जिताम् ॥ ४३ ॥ इत्येतद्द्रुहिणवचो निशम्य रामः श्रुतिमुखमात्महितं पराभिमर्दि ॥ शुचमनुविजहौ विचार्य किंचिज्जनकसुतामनुपश्यति स्म पश्चात् ॥ ४४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणेवाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे रामा- श्वासनं नाम चतुर्विंशतितमः सर्गः ॥ २४ ॥

हे राम ! आप इन जानकीको देखिये भय त्यागन कीजिये, यह साक्षात् निर्गुण सत् असत् व्यक्तिसे रहित हैं ॥ ४३ ॥ इस प्रकार ब्रह्माजीके वचन

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(१३४) अद्भुतरामायण [ पंचविंशति-

सुनकर रघुनन्दन राम जो कानोंके सुख देनेवाले आत्माको हितकारक शत्रु-नाशक थे रामने शोक त्याग किया पीछे जानकीको देखा ॥ ४४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वा. अदिका. अद्भु. ज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषा-टीकायांरामाश्वासनं नाम चतुर्विंशतितमः सर्गः ॥ २४ ॥


पंचविंशति सर्ग

रामचन्द्रका सहस्रनामसे जानकी की स्तुति करना

ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा रामः कमललोचनः । प्रोन्मील्य शनकैरक्ष वेपमानो महाभुजः ॥ १ ॥ प्रणम्य शिरसा भूमौ तेजसा चापि विह्वलः ॥ भीतः कृतांजलिपुटः प्रोवाच परमेश्वरीम् ॥ २ ॥
का त्वं देवि विशालाक्षि शशांका वयवांकिते ॥ न जाने त्वां महादेवि यथावद् ब्रूहि पृच्छते ॥ ३ ॥ रामस्य वचनं श्रुत्वा ततः सा परमेश्वरी ॥ व्याजहार रघुव्याघ्रं योगिनामभयप्रदा ॥ ४ ॥

कमललोचन राम ब्रह्माजीके वचन सुनकर शनैः २ नेत्र खोल कम्पित होते हुए महाभुज ॥ १ ॥ भूमिमें शिर झुकाय प्रणाम कर उनके तेजसे विह्वल हो भीतके समान हाथ जोड परमेश्वरीसे बोले ॥ २ ॥ हे चन्द्रखण्डसे अंकित विशाललोचनी ! तुम कौन हो ? हे महादेवि ! हम तुमको नहीं जानते पूछते हुए अपनेको वर्णन करो ॥ ३ ॥ तब वह परमेश्वरी रामके वचन सुनकर योगियोंको अभय देनेवाली रघुनाथजीसे बोली ॥ ४ ॥

मां विद्धि परमां शक्तिं महेश्वरसमाश्रयाम्।अनन्यामव्ययामेकां यां पश्यन्ति मुमुक्षवः ॥ ५ ॥ अहं वै सर्वभावानामात्मा सर्वांतरा शिवा ॥ शाश्वती सर्वविज्ञाना सर्वमूर्तिप्रवर्तिका ॥ ६ ॥

मुझे महेश्वरके आश्रितवाली परमशक्ति जानों, मैं अनन्य अविनाशी एक हूँ, मुमुक्षुजन मुझको देखते हैं ॥ ५ ॥ मैं सब भावोंकी आत्मा सबके अन्तमें स्थित शिवा हूँ, मैं ही निरन्तर रहनेवाली सब विज्ञान और सब मूर्ति प्रवृत्त करनेवाली हूँ ॥ ६ ॥

अनंतानंतमहिमा संसारार्णवतारिणी ॥ दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे पदमैश्वरम् ॥ ७ ॥ इत्युक्त्वा विररामैषा रामोऽपश्यच्च तत्पदम् ॥ कोटिसूर्यप्रतीकाशं विश्वक्तेजोनिराकुलम् ॥ ८ ॥

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• सर्ग ] हिन्दीटीकासहित ( १३६ )

मैं अनन्त अनन्तमहिमावाली संसारसागरसे तारनेवाली हूँ, तुमको दिव्य-नेत्र देती हूं मेरा ईश्वरसंबन्धी पद देखो ॥ ७ ॥ यह कह वह मौन हुई, और रघुनाथ उनकें पदको देखने लगे, जो करोड सूर्यके समान सब ओरसे परिपूर्ण था ॥ ८ ॥

ज्वालावलीसहस्राढ्यं कालानलशतोपमम् ॥ तदंष्ट्राकरालं दुर्धर्षं जटामण्डलमंडितम् ॥ ९ ॥ त्रिशूलवरहस्तं च घोररूपं भयावहम् ॥ प्रशाम्यत्सौम्यवदनमनंतैश्वर्यसंयुक्तम् ॥ १०॥ चन्द्रावयवलक्ष्माढ्यं चन्द्रकोटिसमप्रभम् ॥ किरीटिनं गदाहस्तं नूपुरैरुपशोभितम् ॥ ११ ॥ दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगंधानुलेपनम् ॥ शंखचक्रकरं काम्यं त्रिनेत्रं कृत्तिवाससम् ॥ १२ ॥

सहस्रों ज्वालासमूहोंसे व्याप्त, कालानल सौके समान दंष्ट्राकरालसे दुर्धर्ष, जटामंडलासे मंडित ॥ ९ ॥ त्रिशूल हाथमें लिये घोर रूप भयावने प्रशांत सौम्यवदन अनन्त ऐश्वर्यसे संयुक्त ॥ १० ॥ चन्द्रके खण्ड और लक्ष्मीसे युक्त करोड चन्द्रमाकेसमान कान्तिमान् किरीट गदा हाथमें लिये, नूपुरोंसे शोभित ॥ ११ ॥ दिव्य माला वस्त्र धारणकिये, दिव्य गंधका अनुलेपन लगाय, शंख चक्र हाथमें लिये, त्रिनेत्र, कृत्ति-वा ॥ १२ ॥

अन्तःस्थं चांडबाह्यस्थं बाह्याभ्यंतरतःपरम् ॥ सर्वशक्तिमयं शांतं सर्वाकारं सनातनम् ॥ १३॥ ब्रह्मेन्द्रोपेंद्रयोगींद्रैरीड्यमानपदांबुजम् ॥ सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोक्षिशिरोमुखम् ॥ १४ ॥

अन्तरमें स्थित तथा अण्डकोशके बाह्यमें स्थित, बाहर भीतरसे परे सर्वशक्तिमान शान्त सर्वाकार सनातन ॥ १३ ॥ ब्रह्मा इन्द्र उपेंद्र योगीन्द्रोंसे प्रार्थित चरण कमल, सब ओरसे चरण नेत्र और शिरवाले ॥ १४ ॥

  • सर्वमावृत्य तिष्ठन्तं ददर्श पदमैश्वरम् ॥ दृष्ट्वा च तादृशं रूपं दिव्यं माहेश्वरं पदम् ॥ १५ ॥ तयैव च समाविष्टः स रामो हृतमानसः ॥ आत्मन्याधाय चात्मानमोंकारं समनुस्मरन् ॥ १६ ॥

सबको आवृत्त कर स्थित होते हुए उस ईश्वरसम्बन्धी पदका दर्शन किया. इस प्रकारका उस दिव्य माहेश्वरके पदको देखकर ॥ १५ ॥ रामचंद्र मनके हरण हो जानेमें उनसे आविष्ट हो हृतमन होकर आत्माको आत्मामें ध्यान कर ॐ कारका स्मरण कर ॥ १६ ॥

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(१३६) अद्भुतरामायण [ पंचविंशति-

नाम्नामष्टसहस्रेण तुष्टाव परमेश्वरम् ।। ॐ सीतोमा परमा शक्तिरनंता निष्कलामला ।। १७ ।। शांता माहेश्वरी नित्या शाश्वती १० परमाक्षरा ।। अचिन्त्या केवलानंता शिवात्मा परमात्मिका ।। १८ ।। १००८ एक हजार आठ नामसे परमेश्वरीकी स्तुति करने लगे, ॐ सीता, उमा परमा, शक्ति, अनन्ता, निष्कला, अमला ।। १७ ।। शांता, माहेश्वरी, शाश्वती, १०, परमाक्षरा, अचिंत्या, केवला, अनंता, शिवात्मा, परमात्मिका १८।

अनादिरव्यया शुद्धा देवात्मा २० सर्वगोचरा ।। एकानेकविभा- गस्था मायातीता सुनिर्मला ।। १९ ।। महामाहेश्वरी शक्ता महादेवी निरंजना ।। काष्ठा ३० सर्वांतरस्था च चिच्छक्तिरति लालसा ।। २० ।। अनादि, अव्यया, शुद्धा देवात्मा २० सर्वगोचरा, एक अनेक विभागमें स्थित मायासे परे निर्मल ।। १९ ।। महामाहेश्वरी, शक्ता, महादेवी, निरंजना, काष्ठा ३० सर्वांतरस्था, चिच्छक्ति, अति लालसा ।। २० ।।

जानकी मिथिलानंदा राक्षसांताविधायिनी ।। रावणांतकरी रम्या रामवक्षःस्थलालया ।। २१ ।। उमा सर्वात्मिका ४० विद्या ज्योतीरू- पाऽयुताक्षरी ।। शांतिः प्रतिष्ठा सर्वेषां निवृत्तिरमृतप्रदा ।। २२ ।। जानकी, मिथिलाके जनोंको आनंदकी देनेवाली, राक्षसोंका अंत करनेवाली, रावणका अंत करनेवाली, मनोहर रामके वक्षस्थलमें विहार करनेवाली ।। २१ । उमा, सर्वात्मिका ४०, विद्या, ज्योतिरूपा, अयुताक्षरी, शांति, सबकी प्रतिष्ठा, निवृत्ति, अमृत देनेवाली ।। २२ ।।

व्योममूर्तिर्व्योममयी व्योमाधारा ५० ऽच्युतातलता ।। अनादि- निधना योषा कारणात्मा कलांकुला ।। २३ ।। नंदप्रथमजा नाभिर- मृतस्यांतसंश्रया ।। प्राणेश्वरप्रिया ६० मातामही महिषवाहना २४ व्योममूर्ति, व्योममयी, व्योमाधारा ५० अच्युता, लता, आदिअन्तरहिता, योषा, कारणात्मा, कुलाकुला ।। २३ ।। नन्दके यहां प्रथम उत्पन्न होनेवाली नाभिमें अमृतके आश्रयवाली, प्राणेश्वरप्रिया ६०, मातामही महिषवाहन- वाली ।। २४ ।।

प्राणेश्वरी प्राणरूपा प्रधानपुरुषेश्वरी ।। सर्वशक्तिः कला काष्ठा ज्योत्स्नेन्दो ७० र्महिमास्पदा ।। २५ ।। सर्वकार्यनियंत्री च सर्वभूते- श्वरीश्वरी ।। अनादिरव्यक्तगुणा महानन्दा सनातनी ।। २६ ।।

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१३७)

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सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१३७)

प्राणेश्वरी, प्राणरूपा, प्रधानपुरुषेश्वरी, सर्वशक्ति, कला काष्ठा, चन्द्रमाकी ज्योत्स्ना ७०, महिमाके स्थानवाली ॥ २५ ॥ सब कार्यकी नियंत्री, सर्वभूतेश्वरोंकी ईश्वरी, अनादि, अव्यक्तगुण, महानंदा, सनातनी ॥ २६ ॥

आकाशयोनियोंनस्था सर्वयोगेगेश्वरेश्वरी ॥ ८० ॥ शवासना चितांतःस्था महेशी वृषवाहना ॥ २७ ॥ बालिकातरुणी वृद्धा वृद्धमाता जरातूरा ॥ महामाया ९० सुदुष्पूरा मूलप्रकृतिरीश्वरी । २८ ।

आकाशसे उत्पन्न होनेवाली, योगमें स्थित सर्वयोगेश्वरोंकी ईश्वरी ८०, शवासना, चिताके अंतमें स्थित, महेशी, वृषवाहनवाली ॥ २७ ॥ बालिका, तरुणी, वृद्धा, वृद्धमाता, जरासे आतुर महामाया ९०, सुदुष्पूर, मूलप्रकृति, ईश्वरी ॥ २८ ॥

संसारयोनिःसकला सर्वशक्तिसमुद्भवा ॥ संसारसारा दुर्बारा दुर्निरीक्ष्यादुरासदा १०० । २९ ॥ प्राणशक्तिः प्राणविद्यायोगिनीपरमा कला ॥ महाविभूतिर्दुर्घर्षा मूलप्रकृतिसम्भवा ॥ ३० ॥

संसारयोनि, सर्वस्वरूपा, सब शक्तिसे उत्पन्न होनेवाली, संसारसारा, दुर्बारा, कठिनतासे नेत्रगोचर होनेवाली, दुरासद १०० ॥ २९ ॥ प्राणशक्ति, प्राणविद्या, योगिनी, परमा, कला, महाविभूति, दुर्धर्षा मूलप्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाली ॥ ३० ॥

अनाद्येनन्तविभवा परात्मा पुरुषो बली ॥ ११० ॥ सर्गस्थित्यंतकरणी सुदुर्वाच्या दुरत्यया ॥ ३१ ॥ शब्दयोनिश्र्शब्दमयी नादाख्या नादविग्रहा ॥ प्रधानपुरुषातीता प्रधानपुरुषात्मिका ॥ ३२ ॥

अनादि अनंत ऐश्वर्यंवाली, परमात्मा, पुरुष, बली ११० सृष्टिकी स्थिति और अंत करनेवाली, कहनेमें न आनेवाली, दुरत्यय ॥ ३१ ॥ शब्दसे उत्पन्न होनेवाली, शब्दमयी, नाद नामवाली, तथानादविग्रहवाली, प्रधानपुरुषसे परे, प्रधानपुरुषात्मिका ॥ ३२ ॥

पुराणी १२० चिन्मयी पुंसामादिः पुरुषरूपिणी ॥ भूतांतरात्मा कूटस्था महापुरुषसंज्ञिता ॥ ३३ ॥ जन्ममृत्युजरातीता सर्वशक्तिसमन्विता ॥ व्यापिनी चानवच्छिन्ना १३० प्रधाना सुप्रवेशिनी ॥ ३४ ॥

पुराणी १२० चिन्मयी, पुरुषोंमें आदि पुरुषके रूपवाली, भूतांतरात्मा, महापुरुष नामवाली ॥ ३३ ॥ जन्म मृत्यु जरासे परे, सब शक्तिसे संयुक्त, व्यापिनी, अनवच्छिन्ना १३०, प्रधानमें प्रवेश करनेवाली ॥ ३४ ॥