अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
by महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल)
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Read in contextसर्ग ३ ] अरण्यकाण्ड ११५
सदा भूयाद्धरे सङ्गस्त्वद्भक्तेषु विशेषतः ।
अद्य मे सफलं जन्म भवत्सन्दर्शनादभूत् ॥४२॥
अद्य मे क्रतवः सर्वे बभूवुः सफलाः प्रभो ।
दीर्घकालं मया तप्तमनन्यमतिना तपः ।
तस्यैह तपसो राम फलं तव यदर्चनम् ॥४३॥
सदा मे सीतया सार्धं हृदये वस राघव ।
गच्छतस्तिष्ठतो वापि स्मृतिः स्यान्मे सदा त्वयि ॥
मुझे अधिकतर आपके भक्तोंका संग प्राप्त हो । हे नाथ ! आज आपके दर्शनोंसे मेरा जन्म सफल हो गया ॥ ४०–४२ ॥ हे प्रभो ! आज मेरे सम्पूर्ण यज्ञ सफल हो गये । मैंने बहुत समयसे अनन्य भावसे तपस्या की है । हे राम ! आज जो मैंने आपकी प्रत्यक्ष पूजा की यह उस तपस्याका ही फल है ॥ ४३ ॥ हे राघव ! सीताके सहित आप सर्वदा मेरे हृदयमें निवास करें; मुझे चलते-फिरते सदा आपका स्मरण बना रहे ॥४४॥
इति स्तुत्वा रमानाथमगस्त्यो मुनिसत्तमः ।
ददौ चापं महेन्द्रेण रामार्थे स्थापितं पुरा ॥४५॥
अक्षय्यौ बाणतूणीरौ खड्गो रत्नविभूषितः ।
जहि राघव भूभारभूतं राक्षसमण्डलम् ॥४६॥
यदर्थमवतीर्णोऽसि मायया मनुजाकृतिः ।
इतो योजनयुग्मे तु पुण्यकाननमण्डितः ॥४७॥
अस्ति पञ्चवटीनाम्ना आश्रमो गौतमीतटे ।
नेतव्यस्तत्र ते कालः शेषो रघुकुलोद्वह ॥४८॥
तत्रैव बहुकार्याणि देवानां कुरु सत्पते ॥४९॥
लक्ष्मीपति श्रीरघुनाथजीकी इस प्रकार स्तुति कर मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यजीने उन्हें पूर्वकालमें रामहीके लिये इन्द्रका दिया हुआ धनुष, बाणोंसे भरे हुए कभी खाली न होनेवाले दो तरकश तथा एक रत्नजटित खड्ग दिया और कहा—"हे राघव ! पृथिवीके भाररूप राक्षसोंका संहार करो ॥ ४५-४६ ॥ जिसके लिये आपने माया-मानव-रूपसे अवतार लिया है । यहाँसे दो योजनकी दूरीपर गौतमी नदीके किनारे पवित्र वनसे सुशोभित एक पञ्चवटी नामक आश्रम है । हे रघुनाथजी ! आप अपना शेष काल वहीं व्यतीत करें । हे सत्पते ! वहीं रहकर आप देवताओंके बहुत-से कार्य सिद्ध करें" ॥ ४७–४९ ॥
श्रुत्वा तदागस्त्यसुभाषितं वचः
स्तोत्रं च तत्त्वार्थसमन्वितं विभुः ।
मुनिं समाभाष्य मुदान्वितो ययौ
प्रदर्शितं मार्गमशेषविद्वरिः ॥५०॥
तदनन्तर सर्वज्ञ भगवान् राम अगस्त्यजीका यह मनोहर भाषण और तत्त्वार्थगर्भित स्तोत्र सुन उनसे बातचीत कर प्रसन्नतापूर्वक उनके दिखाये हुए मार्गसे चले ॥ ५० ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
अरण्यकाण्डे तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥