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अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

by महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल)

DevanagariHindipublished423 pages

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३०२अध्यात्मरामायण[ सर्ग १३

प्राणापानौ निश्चयबुद्ध्या हृदि रुद्ध्वा<br>$\quad$छित्त्वा सर्वं संशयबन्धं विषयौघान् ।<br>पश्यन्तीशं यं गतमोहा यतयस्तं<br>$\quad$वन्दे रामं रत्नकिरीटं रविभासम् ॥११॥ | प्राण और अपानको हृदयमें रोककर तथा अपने सम्पूर्ण संशय-बन्धन और विषय-वासनाओंका छेदन कर जिस ईश्वरका दर्शन करते हैं उन रत्नकिरीटधारी, सूर्यके समान तेजस्वी भगवान् रामको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ११ ॥ मायातीतं माधवमाद्यं जगदादिं<br>$\quad$मानातीतं मोहविनाशं मुनिवन्द्यम् ।<br>योगिध्येयं योगविधानं परिपूर्णं<br>$\quad$वन्दे रामं रञ्जितलोकं रमणीयम् ॥१२॥ | जो मायासे परे, लक्ष्मीके पति, सबके आदिकारण, जगत्के उत्पत्ति-स्थान, प्रत्यक्षादि प्रमाणों-से परे, मोहका नाश करनेवाले, मुनिजनोंसे वन्दनीय, योगियोंसे ध्यान किये जानेयोग्य, योगमार्गके प्रवर्त्तक, सर्वत्र परिपूर्ण और सम्पूर्ण संसारको आनन्दित करनेवाले हैं उन परम सुन्दर भगवान् रामको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १२ ॥ भावाभावप्रत्ययहीनं भवमुख्यै-<br>$\quad$र्योग्यासक्तैरर्चितपादाम्बुजयुग्मम् ।<br>नित्यं शुद्धं बुद्धमनन्तं प्रणवाख्यं<br>$\quad$वन्दे रामं वीरमशेषासुरदावम् ॥१३॥ | जो भाव और अभावरूप दोनों प्रकारकी प्रतीतियोंसे रहित हैं, तथा जिनके युगलचरणकमलों-का योगपरायण शंकर आदि पूजन करते हैं और जो नित्य, शुद्ध, बुद्ध और अनन्त हैं, सम्पूर्ण दानवोंके लिये दावानलके समान उन ओंकारनामक वीरवर रामको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १३ ॥ त्वं मे नाथो नाथितकार्याखिलकारी<br>$\quad$मानातीतो माधवरूपोऽखिलधारी ।<br>भक्त्या गम्यो भावितरूपो भवहारी<br>$\quad$योगाभ्यासैर्भावितचेतःसहचारी ॥१४॥ | हे राम ! आप मेरे प्रभु हैं और मेरे सम्पूर्ण प्रार्थित कार्योंको पूर्ण करने-वाले हैं, आप देश-कालादि मान (परिमाण) से रहित, नारायणस्वरूप, अखिल विश्वको धारण करनेवाले, भक्तिसे प्राप्य, अपने स्वरूपका ध्यान किये जाने-पर संसार-भयको दूर करनेवाले और योगाभ्यास-से शुद्ध हुए चित्तमें विहार करनेवाले हैं ॥ १४ ॥ त्वामाद्यन्तं लोकततीनां परमीशं<br>$\quad$लोकानां नो लौकिकमानैरधिगम्यम् ।<br>क्तैश्श्रद्धाभावसमेतैर्भजनीयं<br>$\quad$वन्दे रामं सुन्दरमिन्दीवरनीलम् ॥१५॥ | आप इस लोक-परम्पराके आदि और अन्त (अर्थात् उत्पत्ति और प्रलयके स्थान) हैं, सम्पूर्ण लोकोंके महेश्वर हैं, आप किसी भी लौकिक प्रमाणसे जाने नहीं जा सकते, आप तो भक्ति और श्रद्धासम्पन्न पुरुषोंद्वारा ही भजन किये जानेयोग्य हैं, ऐसे नील-कमलके समान श्यामसुन्दर आप श्रीरामचन्द्रजीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १५ ॥ को वा ज्ञातुं त्वामतिमानं गतमानं<br>$\quad$मायासक्तो माधव शक्तो मुनिमान्यम् ।<br>वृन्दारण्ये वन्दितवृन्दारकवृन्दं<br>$\quad$वन्दे रामं भवसुखवन्द्यं सुखकन्दम् ॥१६॥ | हे लक्ष्मीपते ! आप प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे परे तथा सर्वथा निर्मान हैं। मायामें आसक्त कौन प्राणी आपको जाननेमें समर्थ हो सकता है ? आप महर्षियोंके माननीय हैं, तथा (कृष्णावतार-के समय) वृन्दावनमें अखिल देवसमूहकी वन्दना करते हुए भी रामरूपसे शिव आदि देवताओंके स्वयं वन्दनीय हैं; ऐसे आप आनन्दघन भगवान् रामको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १६ ॥ नानाशास्त्रैर्वेदकदम्बैः प्रतिपाद्यं | जो नाना शास्त्र और वेदसमूहसे प्रतिपादित नित्य आनन्दस्वरूप, निर्विकल्प ज्ञान-