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अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

by महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल)

DevanagariHindipublished423 pages

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३२०अध्यात्मरामायण[सर्ग १५

चन्द्रसूर्यशिखिमध्यगतं<br>यत्तेज ईश चिदशेषतनूनाम्।<br>ग्रामवत्तनुभृतामिव धैर्यं<br>शौर्यमायुरखिलं तव सत्त्वम् ॥५६॥ | में जो धैर्य, शौर्य और आयुर्बल-सा दिखायी देता है, वह आपकी ही सत्ता है ॥ ५६ ॥ त्वं विरिश्विशिवविष्णुविभेदात्-<br>कालकर्मशशिसूर्यविभागात् ।<br>वादिनां पृथगिवेश विभासि<br>ब्रह्म निश्चितमनन्यदिहैकम् ॥५७॥ | हे राम ! भिन्न-भिन्न ईश्वरवादियोंको एक आप ही ब्रह्मा, महादेव और विष्णुके तथा काल, कर्म, चन्द्रमा और सूर्यके भेदसे पृथक्-पृथक्‌से भासते हैं; किन्तु इसमें सन्देह नहीं, वास्तवमें आप ही एक अद्वितीय ब्रह्म ही ॥ ५७ ॥ मत्स्यादिरूपेण यथा त्वमेकः<br>श्रुतौ पुराणेषु च लोकसिद्धः।<br>तथैव सर्वं सदसद्विभाग-<br>स्त्वमेव नान्यद्भवतो विभाति ॥५८॥ | जिस प्रकार वेद, पुराण और लोकमें आप एक ही मत्स्यादि अनेक रूपोंसे प्रसिद्ध हैं, उसी प्रकार संसारमें जो कुछ सत्-असत्-रूप-विभाग है, वह आप ही हैं—आपसे भिन्न और कुछ नहीं है ॥ ५८ ॥ यद्यत्समुत्पन्नमनन्तसृष्टा-<br>वुत्पत्स्यते यच्च भवच्च यच्च ।<br>न दृश्यते स्थावरजङ्गमादौ<br>त्वया विनातः परतः परस्त्वम् ॥५९॥ | इस अनन्त सृष्टिमें जो कुछ उत्पन्न हुआ है, जो उत्पन्न होगा और जो हो रहा है, उस स्थावर-जङ्गमादिरूप सम्पूर्ण प्रपञ्चमें आपके बिना और कोई दिखायी नहीं देता। अतः आप (प्रकृति आदि) परसे भी पर हैं ॥ ५९ ॥ तत्त्वं न जानन्ति परात्मनस्ते<br>जनाः समस्तास्तव माययाऽतः।<br>त्वद्भक्तसेवाऽमलमानसानां<br>विभाति तत्त्वं परमेकमैशम् ॥६०॥ | हे राम ! आपकी मायासे मोहित होनेके कारण सब लोग आपके परमात्मस्वरूपका तत्त्व नहीं जानते। अतः जिनका अन्तःकरण आपके भक्तोंकी सेवाके प्रभावसे निर्मल हो गया है उन्हींको आपका अद्वितीय ईश्वर-रूप भासता है ॥ ६० ॥ ब्रह्मादयस्ते न विदुः स्वरूपं<br>चिदात्मतत्त्वं बहिरर्थभावाः।<br>ततो बुधस्त्वामिदमेव रूपं<br>भक्त्या भजन्मुक्तिमुपैत्यदुःखः ॥६१॥ | जिनकी बाह्य पदार्थोंमें सत्यबुद्धि है वे ब्रह्मादि भी आपके चित्स्वरूपको नहीं जानते, (फिर औरोंका तो कहना ही क्या है!) अतः बुद्धिमान् पुरुष इस श्यामसुन्दरस्वरूपसे ही आपका भक्तिपूर्वक भजन करके दुःखोंसे पार होकर मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ ६१ ॥ अहं भवन्नाम गृणन्कृतार्थो<br>वसामि काश्यामर्निशं भवान्या।<br>मुमूर्षमाणस्य विमुक्तयेऽहं<br>दिशामि मन्त्रं तव राम नाम ॥६२॥ | प्रभो ! आपके नामोच्चारणसे कृतार्थ होकर मैं अहर्निश पार्वतीजीके सहित काशीमें रहता हूँ और वहाँ मरणासन्न पुरुषोंको उनके मोक्षके लिये आपके तारक मन्त्र 'राम' नामका उपदेश करता हूँ ॥ ६२ ॥ इमं स्तवं नित्यमनन्यभक्त्या<br>शृण्वन्ति गायन्ति लिखन्ति ये वै।<br>ते सर्वसौख्यं परमं च लब्ध्वा<br>भवत्पदं यान्तु भवत्प्रसादात् ॥६३॥ | (अब आपसे यही प्रार्थना है कि) जो लोग मेरे कहे हुए इस स्तोत्रको अनन्य भक्तिसे नित्यप्रति सुनें, कहें अथवा लिखें वे आपकी कृपासे सम्पूर्ण परमानन्द लाभ करके आपके निज-पदको प्राप्त हों ॥ ६३ ॥

इन्द्र उवाच

रक्षोधिपेनाखिलदेव सौख्यं<br>हृतं च मे ब्रह्मवरेण देव ! | इन्द्र बोले—हे देव ! ब्रह्माजीके वरके प्रभावसे राक्षसराज रावणने मेरे समस्त देवोचित सुखको हर लिया था। अब उस दुष्ट शत्रु राक्षसराजके मारे