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अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

by महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल)

DevanagariHindipublished423 pages

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३५०अध्यात्मरामायण[ सर्ग ४

सीतां वा मातरं वा मे भ्रातॄन्वा कैकयीमथ।<br>न भेतव्यं त्वया ब्रूहि शापितोऽसि ममोपरि ॥४८॥ | भाइयोंके अथवा कैकेयीके विषयमें पुरवासी लोग क्या कहते हैं? मैं तुम्हें अपनी शपथ कराता हूँ, तुम भय न करके सच-सच कहना" ॥४७-४८॥ इत्युक्तः प्राह विजयो देव सर्वे वदन्ति ते ।<br>कृतं सुदुष्करं सर्वं रामेण विदितात्मना ॥४९॥<br>किन्तु हत्वा दशग्रीवं सीतामाहृत्य राघवः ।<br>अमर्षं पृष्ठतः कृत्वा स्वं वेश्म प्रत्यपादयत् ॥५०॥<br>कीदृशं हृदये तस्य सीतासम्भोगजं सुखम् ।<br>या हृता विजनेऽरण्ये रावणेन दुरात्मना ॥५१॥<br>अस्माकमपि दुष्कर्म योषितां मर्षं भवेत् ।<br>यादृग् भवति वै राजा तादृश्यो नियतं प्रजाः ॥५२॥ | भगवान्‌के इस प्रकार पूछनेपर विजयने कहा—<br>"देव ! सभी लोग कहते हैं कि आत्मज्ञानी महाराज रामने जो कार्य किये हैं वे सभी बड़े दुष्कर हैं ॥४९॥ किन्तु उन्होंने रावणको मारकर सीताको बिना किसी प्रकारका सन्देह किये ही अपने साथ लाकर घर रख लिया ( यह ठीक नहीं किया) ॥५०॥ भला, जिस सीताको दुरात्मा रावणने निर्जन वनमें हर लिया था न जाने उसके साथ भोग भोगते हुए उन्हें क्या सुख मिलता है? ॥५१॥ अब हमें भी अपनी स्त्रियोंके दुश्चरित्रको सहन करना पड़ेगा, क्योंकि जैसा राजा होता है प्रजा भी निःसन्देह वैसी ही होती है" ॥५२॥ श्रुत्वा तद्वचनं रामः स्वजनान्पर्यपृच्छत ।<br>तेऽपि नत्वाऽब्रुवन् राममेवमेतन्न संशयः ॥५३॥ | उसके ये वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने अपने आत्मीयोंसे पूछा। उन्होंने भी रघुनाथजीको प्रणाम करके यही कहा कि निःसन्देह ऐसी ही बात है ॥५३॥ ततो विसृज्य सचिवाग्विजयं सुहृदस्तथा ।<br>आहूय लक्ष्मणं रामो वचनं चेदमब्रवीत् ॥५४॥<br>लोकापवादस्तु महान्सीतामाश्रित्य मेऽभवत् ।<br>सीतां प्रातः समानीय वाल्मीकेराश्रमान्तिके ॥५५॥<br>त्यक्त्वा शीघ्रं रथेन त्वं पुनरायाहि लक्ष्मण ।<br>वक्ष्यसे यदि वा किञ्चित्तदा मां हतवानसि ॥५६॥ | तब श्रीरामचन्द्रजीने मन्त्रीगण, विजय और अपने सुहृदोंको विदाकर श्रीलक्ष्मणजीको बुलाया और उनसे इस प्रकार कहने लगे—"भैया लक्ष्मण ! सीताके कारण मेरी बड़ी लोकनिन्दा हो रही है। अतः तुम कल सबेरे ही सीताको रथपर चढ़ाकर वाल्मीकि मुनिके आश्रमके समीप छोड़ आओ । इस विषयमें यदि तुम कुछ कहोगे तो मानो मेरी हत्या ही करोगे" ॥५४-५६॥ इत्युक्तो लक्ष्मणो भीत्या प्रातरुत्थाय जानकीम् ।<br>सुमन्त्रेण रथे कृत्वा जगाम सहसा वनम् ॥५७॥<br>वाल्मीकेराश्रमस्यान्ते त्यक्त्वा सीतामुवाच सः।<br>लोकापवादभीत्या त्वां त्यक्तवान् राघवो वने॥५८॥<br>दोषो न कश्चिन्मे मातर्गच्छाश्रमपदं मुनेः ।<br>इत्युक्त्वा लक्ष्मणः शीघ्रं गतवान् रामसन्निधिम् ॥ | भगवान्‌की ऐसी आज्ञा पाकर लक्ष्मणजी डर गये । उन्होंने सबेरे उठते ही सुमन्त्रसे रथ जुड़वाया और उसमें जानकीजीको चढ़ाकर तुरन्त वनको चल दिये ॥५७॥ वाल्मीकि मुनिके आश्रमपर पहुँचते ही उन्होंने सीताको उतार दिया और उनसे कहा—"रघुनाथजीने लोकापवादसे डरकर तुम्हें त्याग दिया है ॥५८॥ हे मातः ! इसमें मेरा कोई दोष नहीं है, अब तुम मुनीश्वरके आश्रमपर चली जाओ ।" सीताजीसे इस प्रकार कह लक्ष्मणजी तुरन्त श्रीरामचन्द्रजीके पास चले आये ॥ ५९ ॥ सीताऽपि दुःखसन्तप्ता विललापातिमुञ्चवत् । | उस समय सीताजी अत्यन्त दुःखार्ता होकर अति