अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
by महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल)
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Read in context| ३५४ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ५ |
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तदैव माया प्रविलीयतेऽञ्जसा<br>सकारका कारणमात्मसंसृतेः ॥१८॥<br>श्रुतिप्रमाणाभिविनाशिता च सा<br>कथं भविष्यत्यपि कार्यकारिणी ।<br>विज्ञानमात्रादमलाद्वितीयरू-<br>स्तस्मादविद्या न पुनर्भाविष्यति ॥१९॥<br>यदि स्म नष्टा न पुनः प्रसूयते<br>कर्ताऽहमस्येति मतिः कथं भवेत् ।<br>तस्मात्स्वतन्त्रा न किमप्यपेक्षते<br>विद्या विमोक्षाय विभाति केवला ॥२०॥<br>सा तैत्तिरीयश्रुतिराह सादरं<br>न्यासं प्रशस्ताखिलकर्मणां स्फुटम् ।<br>एतावदित्याह च वाजिनां श्रुति-<br>र्ज्ञानं विमोक्षाय न कर्म साधनम् ॥२१॥<br>विद्यासमत्वेन तु दर्शितस्त्वया<br>क्रतुर्न दृष्टान्त उदाहृतः समः ।<br>फलैः पृथक्त्वाद्वहुकारकैः क्रतुः<br>संसाध्यते ज्ञानमतो विपर्ययम् ॥२२॥<br>सप्रत्यवायो ह्यहमित्यनात्मधी-<br>रज्ञप्रसिद्धा न तु तत्त्वदर्शिनः ।<br>तस्माद्बुधैस्त्याज्यमविक्रियात्मभि-<br>र्विधानतः कर्म विधिप्रकाशितम् ॥२३॥<br>श्रद्धान्वितस्तत्त्वमसीति वाक्यतो<br>गुरोः प्रसादादपि शुद्धमानसः ।<br>विज्ञाय चैकात्म्यमथात्मजीवयोः<br>सुखी भवेन्मेरुरिवाप्रकम्पनः ॥२४॥<br>आदौ पदार्थावगतिर्हि कारणं | होने लगता है उसी समय आत्माके लिये संसार-प्राप्तिकी कारण माया अनायास ही कारकादिके सहित लीन हो जाती है ॥१८॥ श्रुति-प्रमाणसे उसके नष्ट कर दिये जानेपर फिर वह किसप्रकार अपना कार्य करनेमें समर्थ हो सकती है ? इसलिये उस एकमात्र ज्ञानस्वरूप निर्मल और अद्वितीय बोधकी प्राप्ति होनेपर फिर अविद्या उत्पन्न नहीं हो सकती ॥१९॥ जब एक बार नष्ट हो जानेपर अविद्याका फिर जन्म ही नहीं होता तो बोधवान्को 'मैं कर्ता हूँ' ऐसी बुद्धि कैसे हो सकती है ? इसलिये ज्ञान स्वतन्त्र है उसे जीवके मोक्षके लिये किसी और (कर्मादिकी) अपेक्षा नहीं है, वह स्वयं अकेला ही उसके लिये समर्थ है ॥२०॥ इसके सिवा तैत्तिरीय शाखाकी प्रसिद्ध श्रुति* भी स्पष्ट कहती है कि समस्त कर्मोंका त्याग करना ही अच्छा है, तथा 'एतावत्' इत्यादि वाजसनेयी शाखाकी श्रुति† भी कहती है कि मोक्षका साधन ज्ञान ही है कर्म नहीं ॥२१॥ और तुमने जो ज्ञानकी समानतामें यज्ञादिका दृष्टान्त दिया सो ठीक नहीं है, क्योंकि उन दोनोंके फल अलग-अलग हैं । इसके अतिरिक्त यज्ञ तो (होता, ऋत्विक्, यजमान आदि) बहुत-से कारकोंसे सिद्ध होता है और ज्ञान इससे विपरीत है (अर्थात् वह कारकादिसे साध्य नहीं है) ॥२२॥ (कर्मके त्याग करनेसे) मैं अवश्य प्रायश्चित्त-भागी होऊँगा — ऐसी अनात्म-बुद्धि अज्ञानियोंको हुआ करती है, तत्त्वज्ञानी-को नहीं । इसलिये विकाररहित चित्तवाले बोधवान् पुरुषको विहित कर्मोंका भी विधिपूर्वक त्याग कर देना चाहिये ॥२३॥<br><br>फिर शुद्ध-चित्त होकर श्रद्धापूर्वक गुरुकी कृपासे 'तत्त्वमसि' इस महावाक्यके द्वारा परमात्मा और जीवात्माकी एकता जानकर सुमेरुके समान निश्चल एवं सुखी हो जाय ॥२४॥ यह नियम ही है कि प्रत्येक वाक्यका अर्थ जाननेमें पहले उसके पदोंके |
* 'न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्त्वमानशुः ।
परेण नाकं निहितं गुहायां विभ्राजते यद्यतयो विशन्ति ॥ तै० आ० प्र० १० अ० १०
† 'एतावदरे खल्वमृतत्त्वम्'