अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
by महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल)
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Read in context| सर्ग ५ ] | उत्तरकाण्ड | ३५९ |
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एवं सदाऽभ्यस्तसमाधियोगिनो<br>निवृत्तसर्वेन्द्रियगोचरस्य हि।<br>विनिर्जिताशेषरिपोरहं सदा<br>दृश्यो भवेयं जितषड्गुणात्मनः ॥५३॥ | समान साक्षात् मुक्तस्वरूप हो जाता है ॥५२॥ इस प्रकार जो निरन्तर समाधियोगका अभ्यास करता है, जिसके सम्पूर्ण इन्द्रियगोचर विषय निवृत्त हो गये हैं तथा जिसने काम-क्रोधादि सम्पूर्ण शत्रुओंको परास्त कर दिया है, उस छहों इन्द्रियों (मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियों) को जीतनेवाले महात्माको मेरा निरन्तर साक्षात्कार होता है॥५३॥
ध्यात्वैवमात्मानमहर्निशं मुनि-<br>स्तिष्ठेत्सदा मुक्तसमस्तबन्धनः।<br>प्रारब्धमश्नन्नभिमानवर्जितो<br>मय्येव साक्षात्प्रविलीयते ततः ॥५४॥ | इस प्रकार अहर्निश आत्माका ही चिन्तन करता हुआ मुनि सर्वदा समस्त बन्धनोंसे मुक्त होकर रहे तथा (कर्ता-भोक्तापनके) अभिमानको छोड़कर प्रारब्ध-फल भोगता रहे। इससे वह अन्तमें साक्षात् मुझहीमें लीन हो जाता है ॥५४॥
आदौ च मध्ये च तथैव चान्ततो<br>भवं विदित्वा भयशोककारणम्।<br>हित्वा समस्तं विधिवादचोदितं<br>भजेत्खमात्मानमथाखिलात्मनाम् ॥५५॥ | संसारको आदि, अन्त और मध्यमें सब प्रकार भय और शोकका ही कारण जानकर समस्त वेदविहित कर्मको त्याग दे तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तरात्मारूप अपने आत्माका भजन करे॥ ५५॥
आत्मन्यभेदेन विभावयन्निदं<br>भवत्यभेदेन मयात्मना तदा।<br>यथा जलं वारिनिधौ यथा पयः<br>क्षीरे वियद्व्योमन्यनिले यथानिलः ॥५६॥ | जिस प्रकार समुद्रमें जल, दूधमें दूध, महाकाशमें घटा-काशादि और वायुमें वायु मिलकर एक हो जाते हैं उसी प्रकार इस सम्पूर्ण प्रपञ्चको अपने आत्माके साथ अभिन्नरूपसे चिन्तन करनेसे जीव मुझ परमात्माके साथ अभिन्न भावसे स्थित हो जाता है ॥५६॥
इत्थं यदीक्षेत हि लोकसंस्थितो<br>जगन्मृषैवेति विभावयन्मुनिः।<br>निराकृतत्वाच्छ्रुतियुक्तिमानतो<br>यथेन्दुभेदो दिशि दिग्भ्रमादयः ॥५७॥ | यह जो जगत् है वह श्रुति, युक्ति और प्रमाणसे बाधित होनेके कारण चन्द्रभेद और दिशाओंमें होनेवाले दिग्भ्रम-के समान मिथ्या ही है—ऐसी भावना करता हुआ लोक (व्यवहार) में स्थित मुनि, इसे देखे ॥ ५७ ॥
यावन्न पश्येदखिलं मदात्मकं<br>तावन्मदाराधनतत्परो भवेत्।<br>श्रद्धालुरत्यूर्जितभक्तिलक्षणो<br>यस्तस्य दृश्योऽहमहर्निशं हृदि ॥५८॥ | जबतक सारा संसार मेरा ही रूप दिखलायी न दे तब-तक निरन्तर मेरी आराधना करता रहे। जो श्रद्धालु और उत्कट भक्त होता है उसे अपने हृदयमें सर्वदा मेरा ही साक्षात्कार होता है ॥ ५८ ॥
रहस्यमेतच्छ्रुतिसारसङ्ग्रहं<br>मया विनिश्चित्य तवोदितं प्रिय।<br>यस्त्वेतदालोचयतीह बुद्धिमान्<br>स मुच्यते पातकराशिभिः क्षणात् ॥५९॥ | हे प्रिय ! सम्पूर्ण श्रुतियोंके साररूप इस गुप्त रहस्यको मैंने निश्चय करके तुमसे कहा है। जो बुद्धिमान् इसका मनन करेगा वह तत्काल समस्त पापोंसे मुक्त हो जायगा ॥ ५९ ॥
भ्रातर्यदीदं परिदृश्यते जग-<br>न्मायैव सर्वं परिहृत्य चेतसा। | भाई ! यह जो कुछ जगत् दिखायी देता है वह सब माया है। इसे अपने चित्तसे