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अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

by महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल)

DevanagariHindipublished423 pages

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३६६अध्यात्मरामायण[ सर्गः ७

श्रुत्वा तन्मधुरं गीतमपराह्ने रघूत्तमः ।<br>उवाच भरतं चाभ्यां दीयतामयुतं वसु ॥१३॥<br>दीयमानं सुवर्णं तु न तज्जगृहतुस्तदा ।<br>किमनेन सुवर्णेन राजनौ वन्यभोजनौ ॥१४॥<br>इति सन्त्यज्य सन्दत्तं जग्मतुर्मु निसन्निधिम् ।<br>एवं श्रुत्वा तु चरितं रामः स्वस्यैव विस्मितः ॥१५॥<br>ज्ञात्वा सीताकुमारौ तौ शत्रुघ्नं चेदमब्रवीत् ।<br>हनूमन्तं सुषेणं च विभीषणमथाङ्गदम् ॥१६॥<br>भगवन्तं महात्मानं वाल्मीकिं मुनिसत्तमम् ।<br>आनयध्वं मुनिवरं ससीतं देवसम्मितम् ॥१७॥<br>अस्यास्तु पर्षदो मध्ये प्रत्ययं जनकात्मजा ।<br>करोतु शपथं सर्वे जानन्तु गतकल्मषाम् ॥१८॥<br>सीतां तद्वचनं श्रुत्वा गताः सर्वेऽतिविस्मिताः ।<br>ऊचुर्यथोक्तं रामेण वाल्मीकिं रामपार्षदाः ॥१९॥<br>रामस्य हृद्गतं सर्वं ज्ञात्वा वाल्मीकिरब्रवीत् ।<br>श्वः करिष्यति वै सीता शपथं जनसंसदि ॥२०॥<br>योषितां परमं दैवं पतिरेव न संशयः ।<br>तच्छ्रुत्वा सहसा गत्वा सर्वे प्रोचुर्मुनेर्वचः ॥२१॥<br>राघवस्यापि रामोऽपि श्रुत्वा मुनिवचस्तथा ।<br>राजानो मुनयः सर्वे शृणुध्वमिति चाब्रवीत् ॥२२॥<br>सीतायाः शपथं लोका विजानन्तु शुभाशुभम् ।<br>इत्युक्ता राघवेणाथ लोकाः सर्वे दिदृक्षवः ॥२३॥<br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चैव महर्षयः ।<br>वानराश्च समाजग्मुः कौतूहलसमन्विताः ॥२४॥<br>ततो मुनिवरस्तूर्णं ससीतः समुपागमत् ।<br>अग्रतस्तमृषिं कृत्वाऽऽयान्ती किञ्चिदवाङ्मुखी २५<br>कृताञ्जलिर्बाष्पकण्ठा सीता यज्ञं विवेश तम् ।<br>दृष्ट्वा लक्ष्मीमिवायान्तीं ब्रह्माणमनुयायिनीम् ॥२६॥ | वह मधुर गान सुनकर श्रीरघुनाथजीने दिन ढलने-पर भरतजीसे कहा—"इन्हें दश सहस्र सुवर्ण-मुद्रा दो" ॥ १३ ॥ किन्तु उन बालकोंने उस दिये हुए सुवर्णको ग्रहण न किया । वे ऐसा कहकर कि 'हे राजन् ! हम तो वनके कन्द-मूल-फलादि खानेवाले हैं, हम यह द्रव्य लेकर क्या करेंगे' उस दिये हुए सुवर्णको वहीं छोड़कर मुनिके निकट चले आये । इस प्रकार भगवान् राम अपना ही चरित्र सुनकर विस्मित हो गये ॥ १४-१५ ॥ और उन्हें सीताजीके पुत्र जानकर शत्रुघ्न, हनुमान, सुषेण, विभीषण और अंगदादिसे कहा— ॥ १६ ॥ "देवंतुल्य महानुभाव मुनिश्रेष्ठ भगवान् श्रीवाल्मीकि मुनिको सीताजीके सहित लाओ ॥ १७ ॥ इस सभामें जानकीजी सबको विश्वास करानेके लिये शपथ करें, जिससे सब लोग सीताको निष्कलंक जान जायँ ।" भगवान् रामके ये वचन सुनकर उनके वे सब दूत अति आश्चर्यचकित हो वाल्मीकिजीके पास गये और जैसा श्रीरामचन्द्रजीने कहा था वह सब उनसे कह दिया ॥ १८-१९ ॥ इससे भगवान् रामका आशय जानकर श्रीवाल्मीकिजीने कहा-"सीताजी कल जनसाधारणमें शपथ करेंगी ॥ २० ॥ इसमें सन्देह नहीं, स्त्रियोंके लिये सबसे बड़ा देव पति ही है।" मुनिके ये वचन सुनकर उन सबने सहसा जाकर वे सब बातें रघुनाथजीसे कह दीं। तब श्रीरामचन्द्रजीने मुनिका सन्देश सुनकर कहा—"हे नृपतिगण और मुनिजन ! अब आप सब लोग सीताजीकी शपथ सुनें; और उससे उनका शुभाशुभ जान लें ।"<br><br>भगवान् रामके इस प्रकार कहनेपर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, महर्षि और वानर आदि सभी लोग कुतूहलवश सीताजीकी शपथ देखनेके लिये आये॥ २१-२४ ॥ तब तुरन्त ही सीताजीके सहित मुनीश्वर भी आये । श्रीसीताजीने वाल्मीकि मुनिको आगे कर (उनके पीछे-पीछे) मुख कुछ नीचेको किये हाथ जोड़े गद्गद-कण्ठसे यज्ञशालामें प्रवेश किया । ब्रह्माजीके पीछे आती हुई लक्ष्मीजीके समान सीताजीको वाल्मीकि मुनिके पीछे आती |

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