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अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

by महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल)

DevanagariHindipublished423 pages

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३६८अध्यात्मरामायण[ सर्ग ७

रामादन्यं यथाऽहं वै मनसापि न चिन्तये ।<br>तथा मे धरणी देवी विवरं दातुमर्हति ॥४०॥ | ॥ ३९ ॥ "यदि मैं भगवान् रामके अतिरिक्त अन्य पुरुषका मनसे भी चिन्तन नहीं करती तो पृथिवीदेवी मुझे आश्रय दें" ॥ ४० ॥ तथा शपन्त्याः सीतायाः प्रादुरासीन्महाद्भुतम् ।<br>भूतलाद्दिव्यमत्यर्थं सिंहासनमनुत्तमम् ॥४१॥<br>नागेन्द्रैर्ध्रियमाणं च दिव्यदेहै रविप्रभम् ।<br>भूदेवी जानकीं दोर्भ्यां गृहीत्वा स्नेहसंयुता ॥४२॥<br>स्वागतं तासुवाचैनामासने संन्यवेशयत् ।<br>सिंहासनस्थां वैदेहीं प्रविशन्तीं रसातलम् ॥४३॥<br>निरन्तरा पुष्पवृष्टिर्दिव्या सीतामवाकिरत् ।<br>साधुवादश्च सुमहान् देवानां परमाद्भुतः ॥४४॥<br>ऊचुश्च बहुधा वाचो ह्यन्तरिक्षगताः सुराः ।<br>अन्तरिक्षे च भूमौ च सर्वे स्थावरजङ्गमाः ॥४५॥<br>वानराश्च महाकायाः सीताशपथकारणात् ।<br>केचिच्चिन्तापरास्तस्य केचिद्ध्यानपरायणाः॥४६॥<br>केचिद्रामं निरीक्षन्तः केचित्सीतामचेतसः ।<br>मुहूर्तमात्रं तत्सर्वं तूष्णीं भूतमचेतनम् ॥४७॥ | श्रीसीताजीके इस प्रकार शपथ करते ही भूमितलसे एक अति अद्भुत, परम दिव्य और अत्यन्त श्रेष्ठ सिंहासन प्रकट हुआ ॥ ४१ ॥ उस सूर्यके समान् तेजस्वी सिंहासनको दिव्यशरीरधारी नागराजोंने धारण किया हुआ था। तब पृथिवीदेवीने जानकीजीको अपनी दोनों भुजाओंसे प्रेमपूर्वक ग्रहण कर उनका स्वागत किया और उन्हें आसनपर बिठा लिया। जब श्रीसीताजी सिंहासनपर बैठकर रसातलको जाने लगीं तो उनपर दिव्य पुष्पोंकी निरन्तर वर्षा होने लगी और देवताओंके मुखसे साधुवादका अति अद्भुत और महान् घोष होने लगा ॥ ४२--४४ ॥ आकाशमें स्थित देवगण नाना प्रकारके वचन बोलने लगे । सीताजीके शपथ करनेसे आकाश और पृथिवीतलके समस्त स्थावर-जंगम प्राणियों और बड़े-बड़े डीलवाले वानरोंमेंसे कोई चिन्ता करने लगे, कोई ध्यानस्थ हो गये ॥ ४५-४६ ॥ तथा कोई रामजीकी और कोई सीताजीकी ओर देखकर अचेत हो गये । एक मुहूर्तके लिये वह सारा समाज स्तब्ध और चेतनाशून्य हो गया ॥ ४७॥ सीताप्रवेशनं दृष्ट्वा सर्वं संमोहितं जगत् ।<br>रामस्तु सर्वं ज्ञात्वैव भविष्यत्कार्यगौरवम् ॥४८॥<br>अजानन्निव दुःखेन शुशोच जनकात्मजाम् ।<br>ब्रह्मणा ऋषिभिः सार्धं बोधितो रघुनन्दनः ॥४९॥<br>प्रतिबुद्ध इव स्वप्नाच्चकारानन्तराः क्रियाः ।<br>विससर्ज ऋषीन् सर्वानृत्विजो ये समागताः॥५०॥<br>तान् सर्वान् धनरत्नाद्यैस्तोषयामास भूरिशः ।<br>उपादाय कुमारौ तावयोध्यागमत्प्रभुः ॥५१॥<br>तदादि निःस्पृहो रामः सर्वभोगेषु सर्वदा ।<br>आत्मचिन्तापरो नित्यमेकान्ते समुपस्थितः॥५२॥<br>एकान्ते ध्याननिरते एकदा राघवे सति ।<br>ज्ञात्वा नारायणं साक्षात्कौसल्या प्रियवादिनी ॥५३॥ | सीताजीका पृथिवी-प्रवेश देखकर सारा संसार मोहित हो गया । भगवान् राम आगामी कार्यका सम्पूर्ण महत्व जानते थे तथापि अनजानके समान सीताजीके लिये शोक करने लगे । तब ऋषियोंके सहित ब्रह्माजीने रघुनाथजीको समझाया ॥ ४८-४९ ॥ तदनन्तर उन्होंने सोकर उठे हुएके समान यज्ञका अवशेष कर्म समाप्त किया और यज्ञके ऋत्विक् होकर जो ऋषिगण आये थे उन सबको रत्न और धन आदिसे भली प्रकार सन्तुष्टकर विदा किया। फिर प्रभु राम उन दोनों कुमारोंको साथ लेकर अयोध्यापुरीमें आये ॥ ५०-५१ ॥ तबसे श्रीरामचन्द्रजी सब भोगोंसे विरक्त होकर निरन्तर आत्मचिन्तन करते हुए एकान्तमें रहने लगे ॥ ५२ ॥<br>एक दिन जब श्रीरघुनाथजी एकान्तमें ध्यानमग्न थे, प्रियभाषिणी श्रीकौसल्याजीने उन्हें साक्षात् नारायण