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अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

by महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल)

DevanagariHindipublished423 pages

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सर्ग ८ ] उत्तरकाण्ड [ ३७३


लक्ष्मणस्तु तथेत्युक्त्वा प्रावेशयत तापसम्।<br>स्वतेजसा ज्वलन्तं तं घृतसिक्तं यथाऽनलम् ॥१३॥तब लक्ष्मणजी 'बहुत अच्छा' कह घृताहुतिसे प्रज्वलित हुए अग्निके समान अपने तेजसे देदीप्यमान उस तपस्वीको भीतर ले आये ॥१३॥
सोऽभिगम्य रघुश्रेष्ठं दीप्यमानः स्वतेजसा।<br>मुनिर्मधुरवाक्येन वर्धस्वेत्याह राघवम् ॥१४॥अपनी कान्तिसे प्रकाशमान उस मुनिने श्रीरघुनाथजीके पास पहुँचनेपर उनसे अति मधुर वाणीमें 'आपका अभ्युदय हो' इस प्रकार कहा ॥१४॥
तस्मै स मुनये रामः पूजां कृत्वा यथाविधि।<br>पृष्ट्वाऽनामयमव्यग्रो रामः पृष्टोऽथ तेन सः ॥१५॥तब श्रीरामचन्द्रजीने उस मुनिकी विधिपूर्वक पूजा की और फिर शान्त भावसे रामचन्द्रजीने मुनिसे और मुनिने रामचन्द्रजीसे कुशल पूछी ॥१५॥
दिव्यासने समासीनो रामः प्रोवाच तापसम्।<br>यदर्थमागतोऽसि त्वमिह तत्प्रापयस्व मे ॥१६॥तदनन्तर दिव्यासनपर विराजमान महाराज रामने मुनिसे कहा—"आप जिसलिये यहाँ पधारे हैं वह (सन्देश) मुझसे कहिये" ॥१६॥
वाक्येन चोदितस्तेन रामेणाह मुनिर्वचः।<br>द्वन्द्वमेव प्रयोक्तव्यमनालक्ष्यं तु तद्वचः ॥१७॥भगवान् रामके इस वाक्यसे प्रेरित होकर मुनिने कहा—"यह बात हम दोनोंके बीच ही कही जा सकती है और किसीको प्रकट न होनी चाहिये ॥१७॥
नान्येन चैतच्छ्रोतव्यं नाख्यातव्यं च कस्यचित्।<br>शृणुयाद्वा निरीक्षेत यः स वध्यस्त्वया प्रभो ॥१८॥उसे न तो कोई सुने और न वह किसीसे कही जाय। यदि उसे कोई सुने अथवा देखे तो हे प्रभो ! आपको उसे मारना होगा" ॥ १८ ॥
तथेति च प्रतिज्ञाय रामो लक्ष्मणमब्रवीत्।<br>तिष्ठ त्वं द्वारि सौमित्रे नायात्वत्र जनो रहः ॥१९॥तब रामचन्द्रजीने 'बहुत अच्छा' कह लक्ष्मणजीसे कहा—"लक्ष्मण ! तुम द्वारपर रहो, इस एकान्त स्थानमें मेरे पास कोई न आवे ॥१९॥
यद्यागच्छति को वापि स वध्यो मे न संशयः।<br>ततः प्राह मुनिं रामो येन वा त्वं विसर्जितः ॥२०॥<br><br>यत्ते सनीप्सितं वाक्यं तद्वदस्व समाग्रतः ॥२१॥यदि यहाँ कोई भी आया तो इसमें सन्देह नहीं, वह अवश्य मेरे हाथसे मारा जायगा।" फिर उन्होंने मुनिसे कहा—"तुम्हें जिसने भेजा है और तुम्हारे मनमें जो बात है वह सब मुझसे कहो" ॥२०-२१॥
ततः प्राह मुनिर्वाक्यं शृणु राम यथातथम्।<br>ब्रह्मणा प्रेषितोऽस्मीश कार्यार्थे तेऽन्तिकं प्रभो।<br><br>अहं हि पूर्वजो देव तव पुत्रः परन्तप ॥२२॥तब मुनिने कहा—"हे राम ! जो वास्तविक बात है सो सुनिये। हे ईश ! हे प्रभो ! मुझे एक कार्यके लिये ब्रह्माजीने आपके पास भेजा है। हे देव ! हे शत्रुदमन ! मैं आपका ज्येष्ठ पुत्र हूँ ॥२२॥
मायासङ्गमजो वीर कालः सर्वहरः स्मृतः।<br>ब्रह्मा त्वामाह भगवान् सर्वदेवर्षिपूजितः ॥२३॥<br><br>रक्षितुं स्वर्गलोकस्य समयस्ते महामते।<br>पुरा त्वमेक एवासीर्लोकान् संहृत्य मायया ॥२४॥हे वीर ! मायाके साथ आपका सङ्गम होनेपर मैं प्रकट हुआ था। मैं सबका नाश करनेवाला हूँ और काल नामसे प्रसिद्ध हूँ। समस्त देवर्षियोंसे पूजित भगवान् ब्रह्माजीने आपके लिये कहा है कि 'हे महामते ! अब आपका स्वर्गलोककी रक्षा करनेका समय है। पूर्वकालमें समस्त लोकोंका संहार कर एकमात्र आप ही रह गये थे ॥ २३-२४ ॥
भार्यया सहितस्त्वं मामादौ पुत्रमजीजनः।फिर आपने अपनी भार्या मायाके संयोगसे सबसे पहले अपने