ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextप्रथम अध्याय ९५ योनि से संयुक्त होकर स्वर्ण का शरीर धारण करके स्वर्ग को जाता है । जो पिछले जमाने के यजमान थे वह कहते थे कि स्वरू यूप का टुकड़ा है । ( इस लिये यूप का प्रतिनिधि है ) । इस लिये उसी को अग्नि में डाल ते, इससे दोनों कामनायें पूरी हो जायंगी अर्थात् यूप को अग्नि में छोड़ने से जो बात सिद्ध होती है वह भी और यूप को खड़ा रखने से जो बात सिद्ध होती है वह भी । जो पुरुष दीक्षित होता है वह अपने को सब-देवताओं को प्राप्त कराता है । अग्नि सब देवता हैं । सोम सब देवता हैं । जब वह अग्नि और सोम दोनों के लिये पशु को अर्पण करता है तो यजमान सब देवताओं के लिये अपने को अर्पण करने से छुटकारा पा जाता है । कुछ लोग कहते हैं कि अग्नि और सोम के पशु के दो रूप होने चाहियें क्योंकि यह दो देवताओं का है । परन्तु इसकी आवश्यकता नहीं । यज्ञ का पशु मोटा होना चाहिये । क्योंकि पशु मोटे होते हैं और यजमान पतला होता है । यदि पशु मोटा होगा तो यजमान भी उसके मेध से मोटा होगा । कहते हैं कि अग्नि-सोम के पशु को न खाये । जो अग्नि और सोम के पशु को खाता है वह मनुष्य के मांस को खाता है । क्योंकि इसी के द्वारा तो यजमान अपने को छुड़ाता है । परन्तु इस नियम का आदर करना ठीक नहीं । यह जो अग्नि-सोम का पशु है वह वृत्रघ्न अर्थात् इन्द्र के लिये हवि है । क्योंकि अग्नि और सोम के द्वारा ही तो इन्द्र ने वृत्र को मारा था । उन दोनों ने कहा, "तुमने हमारे द्वारा ही तो वृत्र को मारा है इसलिये हम दोनों वर मांगते हैं ।" उसने कहा "मांगो" । इसलिये उन्होंने इन्द्र से यह वर मांग लिया । इस प्रकार वह उस पशु को लेते हैं जो सोम-इष्टि से पहले दिन मारा जाने वाला होता है ।