ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextप्रथम अध्याय ] ९९ करले। जब मैत्रावरुण आदेश देता है तो वह मन द्वारा वाणी को प्रेरित करता है। मन द्वारा वाणी को प्रेरित करके वह हव्य को देवों के ग्रहण के योग्य करता है । (५) ६-अब होता कहता है, "हे शांति करने वाले देवो और शांति करने वाले मनुष्यो ! आरंभ करो।" इसका तात्पर्य यह है कि जो देवों में शांति करने वाले हैं और जो मनुष्यों में शांति करने वाले हैं उन सब को आदेश करता है। "यज्ञ के स्वामी अर्थात् यजमान और उसकी पत्नी के लिये यज्ञ की सफलता की प्रार्थना करते हुये यज्ञ के योग्य सुन्दर द्वार बनाओ।" पशु मेध है। और यजमान मेधपति है। इस प्रकार होता यजमान को उसी के मेध से बढ़ाता है। इसीलिये वह ठीक कहते हैं कि जिस देवता के लिये पशु लाया जाता है (आलभ्यते) वही मेध-पति हैं। यदि एक देवता के लिये पशु हो तो कहना चाहिये 'मेधपतये' (एकवचन चतुर्थी)। यदि दो देवतों के लिये, तो "मेधपतिभ्यां" (द्विवचन चतुर्थी)। यदि बहुत से देवतों के लिये, तो "मेधपतिभ्यः" (बहुवचन चतुर्थी)। यही स्थिति है। "इसके लिये आग लाओ।" जब पशु को ले जा रहे थे तो उसे सामने मौत दिखाई दी। उसने देवों के पीछे जाना न चाहा तब देवों ने उससे कहा, "तू चला आ ! हम तुझे स्वर्ग को ले जायंगे।" उसने कहा, "अच्छा तुम में से एक आगे-आगे चलो।" उन्होंने कहा, "अच्छा" और अग्नि उसके आगे-आगे चला। और वह अग्नि के पीछे चला। इसीलिये कहते हैं कि प्रत्येक पशु अग्नि का है क्योंकि वह अग्नि का अनुसरण करता है। इसीलिये अग्नि को आगे-आगे ले जाते हैं। "दर्भ बिछा दो।" पशु ओषधियों पर जीता है। इस प्रकार वह पशु को सब आत्मायुक्त करता है (अर्थात् घास पशु का आत्मा है)।