ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context११४ [ दूसरी पञ्चिका- ( हम तेरे लिये बीच में से ली हुई और अत्यन्त ओज वाली चिकनाई को अर्पण करते हैं। हे वसु अग्नि ! तेरी त्वचा पर बूँदें पड़ती हैं। उनको देवों तक ले जा )। पहले मंत्र में जो यह शब्द आये हैं "इमा हव्या जातवेदो जुषस्व" इनसे वह हवि को स्वीकार कराता है। "स्तोकानामग्ने मेदसो घृतस्य" ✤ इसमें घी और मेद ( चर्बी) की बूँदों का वर्णन है। "होता प्राक्षान प्रथमो निषद्य" से तात्पर्य यह है कि देवों का होता अग्नि है। इसलिये होता का अर्थ है अग्नि। दूसरे मन्त्र में है "घृतवंतः पावक ते स्तोका श्चोतंति मेदसः" इसमें घी और चर्बी दोनों का वर्णन है। "स्वधर्म देववीतये श्रेष्ठं नो धेहि वार्यम्" इससे आशीर्वाद चाहता है। तीसरे मन्त्र में तुभ्यं स्तोका घृतश्चुतोऽअग्ने विप्राय सन्त्य" यहाँ घी की बूँदों से तात्पर्य है। "ऋषिः श्रेष्ठः समिध्यसे" यज्ञस्यप्राविता भव" इससे यज्ञ की पूर्ति के लिये आशीर्वाद देता है। चौथे मन्त्र के पहले भाग "तुभ्यं श्चीतन्त्यधिगो...घृतस्य" में घी और चर्बी दोनों का वर्णन है। पिछले भाग "कवि... मेधिर" में हव्य की स्वीकारी के लिये आशीर्वाद है। पाँचवें मन्त्र "ओजिष्ठ......वीहि" के पश्चात् बूंदों के लिये वषट्कार बोलता है। अब वह अनुवषट्कार बोलता है। "सोमस्य अग्ने वीहि" में 'सोम' के स्थान में "स्तोकानां" ऐसा कहता है। बूंदें सब देव- ✤ ब्राह्मण में "मेदसश्च हि घृतस्य च" ऐसा पाठ है। 'च' वेद मंत्र में नहीं है। 'च' के अभाव में 'मेदसः' 'घृतस्य' का विशेषण हो जाता है परन्तु 'च' के द्वारा अलग करने से 'मेदसः' का 'चर्बी' अर्थ होगा।