ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextदूसरा अध्याय ] ११७ १५—अध्वर्यु कहता है, "होता ! प्रातःकाल वाले देवों के लिये अनुवाक्य बोलो।" प्रातःकाल आने वाले देव हैं उषा, अग्नि और दो अश्विन। यह देव सात सात छन्दों द्वारा आ जाते हैं और उसके बुलाने से आ जाते हैं जो इस रहस्य को समझता है। प्रजापति होता के प्रातःकाल के अनुवाक्य बोलने पर देव और असुर यज्ञ में आ पहुँचे और कहने लगे, "यह हमारे लिये कहेगा। यह हमारे लिये कहेगा।" उसने केवल देवों के लिये कहा। इस प्रकार देव असुरों से जीत गये। जो इस रहस्य को समझता है वह अपने शत्रु, अहितकारी के ऊपर विजय पा लेता है। इसको "प्रातरनुवाक्य" कहते हैं। क्योंकि प्रजापति ने प्रातःकाल इसका उच्चारण किया था। बड़ी रात से ही इसका पाठ करना चाहिये। जो पूर्ण वाणी और पूर्ण ब्रह्म का गृहीता होता है और जो श्रेष्ठ होता है उसी की बात लोग मानते हैं। इसलिये बहुत रात से ही उठ कर सबके बोलने से पहले ही पाठ करे (अर्थात् प्रातःकाल सब से पहले उसी की वाणी सुनाई दे)। यदि वह देर से उठकर पाठ करेगा तो उसका पाठ 'पहले कहा हुआ' न होकर दूसरों का 'अनुवाद' स्वरूप हो जायगा। इसलिये बड़ी रात से उठकर पाठ करना चाहिये। मुर्गा से भी पहले बोलना चाहिये। यह जो पक्षी हैं, मुर्गा सहित सब निर्ऋति (मृत्यु?) के मुख हैं। मुर्गा बोलने से पहले 'प्रातरनुवाक्य' बोलने का तात्पर्य यह है कि यदि अन्य (मनुष्य या पशु) अपनी बोली सुना चुकेंगे तो यज्ञ सम्बन्धी वाणी नहीं सुनाई जा सकेगी। इसलिये बड़ी रात से ही अनुवाक का पाठ होना चाहिये। जब अध्वर्यु उपाकर्म (कृत्य) करे तभी होता "प्रातरनुवाक" बोले। जब अध्वर्यु उपाक्रम करता है तो वाणी से ही प्रारंभ